महावीर भगवान की जय

महावीर भगवान की जय

ज्ञान भरे इंसान की जय, इंसान में महान की जय।

सत्य-अहिंसा-प्रेम-प्रदाता, महावीर भगवान की जय॥

‘बिहार’ के होकर बिहार के विहार से कतराते हैं।
’वैशाली’ के थे इस कारण वय-शाली हो जाते हैं।
’कुण्डग्राम’ से धराधाम पर जग अभिराम बनाते हैं।
वृद्धिमान हो ‘वर्द्धमान’ में महावीरता पाते हैं।

त्रिशला की संतान की जय, सुत-सिद्धार्थ सुजान की जय

सत्य-अहिंसा-प्रेम-प्रदाता, महावीर भगवान की जय॥

‘श्रमण-बन्ध’ द्वारा ‘निगण्ठ’ यदि घोर तपस्या धारी है।
सहज भाव से सद् गृहस्थ भी धर्म ध्यान अधिकारी है।
श्रद्धा के अनुसार सभी ‘जिन’ के आलोक पुजारी हैं।
त्रिलोक की क्या, लोक-लोक परलिक सभी आभारी हैं।

धर्म धुरी ध्रुवमान की जय, पावन पथ प्रस्थान की जय।

जड चेतन तक जैन धर्म के विश्वविदित अभियान की जय।

सत्य-अहिंसा-प्रेम-प्रदाता, महावीर भगवान की जय॥

सबसे बढकर दुख, दुनिया में जन्म मरण का होना है।
कारण केवल कर्म, कर्म-फल का हर बोझा ढोना है।
कर्म फलों के मूल रूप में मन के अंकुर बोना है।

मन हिंसा का मूल, सभी कुछ मन का रोना धोना है।

जन-जीवन-जलयान की जय, संयम-सिन्धु सुजान की जय।
जन्म-मरण के रहस्य भेदी, कर्मठ-कर्म-विधान की जय।

सत्य-अहिंसा-प्रेम-प्रदाता, महावीर भगवान की जय॥

सम्यक दर्शन, ज्ञान, चरित्र, अगर जीवन में आते हैं।
प्रपंच तज, यदि पंच-वृत को श्रद्धा से अपनाते हैं।

मुख्य रूप से अगर अहिंसा-परमो धर्म निभाते हैं।

तो भवसागर तज कर प्राणी सहज मोक्ष पद पाते हैं।
पंच-वृत-परिधान की जय, रत्नत्रय की खान की जय।
ब्रह्मचर्य-अस्तेय-अहिंसा-सत्परिग्रह परिणाम की जय।
सत्य-अहिंसा-प्रेम-प्रदाता, महावीर भगवान की जय॥

– कवि सम्राट निर्भय हाथरसी, हाथरस