रावण का जैन दर्शन मे स्थान।

क्या आप अनभिज्ञ है कि हमारी श्री रावण जी के विषय मे गलत- फ़हमियाँ के कारण उनके पुतले के प्रति वर्ष मे कृत, कारित अथवा अनुमोदना से दहन करने से हमारे द्रव्य और भाव हिंसा पाप का बंध होता है।

 रावण  भगवान् शांति नाथ के परम भक्त थे, शांतिनाथ विधान की पूजा सर्वप्रथम उन्होने करी थी। उनकी भक्ति करते समय वीणा का तार टूटने पर तुरंत उन्होने अपने हाथ  की नाड़ी काटकर नस निकाल कर वीणा के तार जोडकर भक्ति को खंडित नही होने दिया और भक्ति करते रहे। जिसके फल स्वरूप उनके तीर्थंकर प्रकृतिबंध हुआ।

किन्तु उससे पूर्व मायाचारी वश उन्हे नरकगति बंध होने से उनके जीव, वर्तमान मे नरक मे नारकी जीवन व्यतीत कर रहे है। सीता जी का जीव सेलहवे स्वर्ग मे २२ सागर की आयुबंध के साथ प्रतींद्र है वहाँ से च्युत होकर उनका जीव रावण के जीव का गणधर बनकर उसी भव से मोक्ष प्राप्त करेगे।

रावण के महल में विशाल स्वर्णमयी 1000 खंभों का शांतिनाथ मंदिर था।

मंदिर का वर्णन-

  अतिशय निपुण श्रीराम सूर्य विमान समान रावण के भवन में जाकर प्रविष्ट हुए। वहां उन्होंने भवन के मध्य में स्थित श्री शांतिनाथ भगवान् का परम सुन्दर मन्दिर देखा।वह मन्दिर यथायोग्य विस्तार और ऊँचाई सहित था,स्वर्णिम  हजार खम्भों से निर्मित ,विशाल कान्ति  धारक, दीवालों के प्रदेश नाना प्रकार के रत्नों से युक्त ,मन को आनन्दित करने  वाला,विदेह क्षेत्र के मध्य में स्थित मेरु पर्वत समान क्षीरसमुद्र के फैन पटल के समान कान्तियुक्त नेत्रों को बांधने वाला,रुणझुण करने वाली किज्र्णियों के समूह एवं बड़ी-बड़ी ध्वजाओं से सुशोभित, मनोज्ञरूप से युक्त था ,उसका वर्णन अशक्य था।

अत: समस्त जैन धर्मानुयायीयो से विनम्र निवेदन है कि रावण जी के पुतले के दहन का कृत तारिक या अनुमोदना द्वारा पापबंध नही करे तथा अपने सम्यक्तव की रक्षा करे ।

जैनागम मे विजयदशमी/दशहरे पर्व का  उल्लेख नही है अतःइसे मनाना मिथ्यात्व का पोषण ही है !

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