आत्म विश्वास

भरतपुर नरेश महाराज रणजीतसिंह सन! 1805 की जनवरी में अंग्रेजो से युद्ध के समय अपने किले की दीवारों पर निर्भीक हो सेना का निरीक्षण कर रहे थे। उनके सैनिकों ने कहा- “अन्नदाता शत्रुओं की तोपे ओले की तरह गोले बरसा रही हैं, आप यहाँ न घूमें।” महाराज ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया- “भैया! जिसकी आ गई है, उसे कोई बचा नहीं सकता और जिसकी आयु शेष है, उसे दुनिया की कोई शक्ति नहीं मार सकती। यह सिद्धान्त अटल है, तब फिर डर कैसा”?

रावण का जैन दर्शन मे स्थान।

क्या आप अनभिज्ञ है कि हमारी श्री रावण जी के विषय मे गलत- फ़हमियाँ के कारण उनके पुतले के प्रति वर्ष मे कृत, कारित अथवा अनुमोदना से दहन करने से हमारे द्रव्य और भाव हिंसा पाप का बंध होता है।

 रावण  भगवान् शांति नाथ के परम भक्त थे, शांतिनाथ विधान की पूजा सर्वप्रथम उन्होने करी थी। उनकी भक्ति करते समय वीणा का तार टूटने पर तुरंत उन्होने अपने हाथ  की नाड़ी काटकर नस निकाल कर वीणा के तार जोडकर भक्ति को खंडित नही होने दिया और भक्ति करते रहे। जिसके फल स्वरूप उनके तीर्थंकर प्रकृतिबंध हुआ।

किन्तु उससे पूर्व मायाचारी वश उन्हे नरकगति बंध होने से उनके जीव, वर्तमान मे नरक मे नारकी जीवन व्यतीत कर रहे है। सीता जी का जीव सेलहवे स्वर्ग मे २२ सागर की आयुबंध के साथ प्रतींद्र है वहाँ से च्युत होकर उनका जीव रावण के जीव का गणधर बनकर उसी भव से मोक्ष प्राप्त करेगे।

रावण के महल में विशाल स्वर्णमयी 1000 खंभों का शांतिनाथ मंदिर था।

मंदिर का वर्णन-

  अतिशय निपुण श्रीराम सूर्य विमान समान रावण के भवन में जाकर प्रविष्ट हुए। वहां उन्होंने भवन के मध्य में स्थित श्री शांतिनाथ भगवान् का परम सुन्दर मन्दिर देखा।वह मन्दिर यथायोग्य विस्तार और ऊँचाई सहित था,स्वर्णिम  हजार खम्भों से निर्मित ,विशाल कान्ति  धारक, दीवालों के प्रदेश नाना प्रकार के रत्नों से युक्त ,मन को आनन्दित करने  वाला,विदेह क्षेत्र के मध्य में स्थित मेरु पर्वत समान क्षीरसमुद्र के फैन पटल के समान कान्तियुक्त नेत्रों को बांधने वाला,रुणझुण करने वाली किज्र्णियों के समूह एवं बड़ी-बड़ी ध्वजाओं से सुशोभित, मनोज्ञरूप से युक्त था ,उसका वर्णन अशक्य था।

अत: समस्त जैन धर्मानुयायीयो से विनम्र निवेदन है कि रावण जी के पुतले के दहन का कृत तारिक या अनुमोदना द्वारा पापबंध नही करे तथा अपने सम्यक्तव की रक्षा करे ।

जैनागम मे विजयदशमी/दशहरे पर्व का  उल्लेख नही है अतःइसे मनाना मिथ्यात्व का पोषण ही है !

आलोचना-पाठ

बंदों पाँचों परम-गुरु, चौबीसों जिनराज।
करूँ शुद्ध आलोचना, शुद्धिकरन के काज ॥

सुनिए, जिन अरज हमारी, हम दोष किए अति भारी।
तिनकी अब निवृत्ति काज, तुम सरन लही जिनराज ॥

इक बे ते चउ इंद्री वा, मनरहित सहित जे जीवा।
तिनकी नहिं करुणा धारी, निरदई ह्वै घात विचारी ॥

समारंभ समारंभ आरंभ, मन वच तन कीने प्रारंभ।
कृत कारित मोदन करिकै, क्रोधादि चतुष्ट्‌य धरिकै॥

शत आठ जु इमि भेदन तै, अघ कीने परिछेदन तै।
तिनकी कहुँ कोलौं कहानी, तुम जानत केवलज्ञानी॥

विपरीत एकांत विनय के, संशय अज्ञान कुनयके।
वश होय घोर अघ कीने, वचतै नहिं जात कहीने॥

कुगुरुनकी सेवा कीनी, केवल अदयाकरि भीनी।
याविधि मिथ्यात भ्रमायो, चहुँगति मधि दोष उपायो॥

हिंसा पुनि झूठ जु चोरी, पर-वनितासों दृग जोरी।
आरंभ परिग्रह भीनो, पन पाप जु या विधि कीनो॥

सपरस रसना घ्राननको, चखु कान विषय-सेवनको।
बहु करम किए मनमाने, कछु न्याय-अन्याय न जाने॥

फल पंच उदंबर खाये, मधु मांस मद्य चित्त चाये।
नहिं अष्ट मूलगुण धारे, विषयन सेये दुखकारे॥

दुइवीस अभख जिन गाये, सो भी निस दिन भुँजाये।
कछु भेदाभेद न पायो, ज्यों त्यों करि उदर भरायौ॥

अनंतानु जु बंधी जानो, प्रत्याख्यान अप्रत्याख्यानो।
संज्वलन चौकड़ी गुनिये, सब भेद जु षोडश मुनिये॥

परिहास अरति रति शोग, भय ग्लानि तिवेद संजोग।
पनवीस जु भेद भये इम, इनके वश पाप किये हम॥

निद्रावश शयन कराई, सुपने मधि दोष लगाई।
फिर जागि विषय-वन भायो, नानाविध विष-फल खायो॥

आहार विहार निहारा, इनमें नहिं जतन विचारा।
बिन देखी धरी उठाई, बिन सोधी बसत जु खाई॥

तब ही परमाद सतायो, बहुविधि विकल्प उपजायो।
कुछ सुधि बुधि नाहिं रही है, मिथ्या मति छाय गई है॥

मरजादा तुम ढिंग लीनी, ताहूँमें दोष जु कीनी।
भिन-भिन अब कैसे कहिये, तुम खानविषै सब पइये॥

हा हा! मैं दुठ अपराधी, त्रस-जीवन-राशि विराधी।
थावर की जतन ना कीनी, उरमें करुना नहिं लीनी॥

पृथ्वी बहु खोद कराई, महलादिक जागाँ चिनाई।
पुनि बिन गाल्यो जल ढोल्यो, पंखातै पवन बिलोल्यो॥

हा हा! मैं अदयाचारी, बहु हरितकाय जु विदारी।
तामधि जीवन के खंदा, हम खाये धरि आनंदा॥

हा हा! मैं परमाद बसाई, बिन देखे अगनि जलाई।
ता मधि जे जीव जु आये, ते हूँ परलोक सिधाये॥

बींध्यो अन राति पिसायो, ईंधन बिन सोधि जलायो।

झाडू ले जागाँ बुहारी, चिवंटा आदिक जीव बिदारी॥

जल छानी जिवानी कीनी, सो हू पुनि डार जु दीनी।
नहिं जल-थानक पहुँचाई, किरिया विन पाप उपाई॥

जल मल मोरिन गिरवायौ, कृमि-कुल बहु घात करायौ।
नदियन बिच चीर धुवाये, कोसन के जीव मराये॥

अन्नादिक शोध कराई, तामे जु जीव निसराई।
तिनका नहिं जतन कराया, गलियारे धूप डराया॥

पुनि द्रव्य कमावन काजै, बहु आरंभ हिंसा साजै।
किये तिसनावश अघ भारी, करुना नहिं रंच विचारी॥

इत्यादिक पाप अनंता, हम कीने भगवंता।
संतति चिरकाल उपाई, बानी तैं कहिय न जाई॥

ताको जु उदय अब आयो, नानाविधि मोहि सतायो।
फल भुँजत जिय दु:ख पावै, वचतै कैसे करि गावै॥

तुम जानत केवलज्ञानी, दु:ख दूर करो शिवथानी।
हम तो तुम शरण लही है, जिन तारन विरद सही है॥

जो गाँवपति इक होवै, सो भी दुखिया दु:ख खोवै।
तुम तीन भुवन के स्वामी, दु:ख मेटहु अंतरजामी॥

द्रोपदि को चीर बढ़ायो, सीताप्रति कमल रचायो।
अंजन से किये अकामी, दु:ख मेटहु अंतरजामी।

मेरे अवगुन न चितारो, प्रभु अपनो विरद निम्हारो।
सब दोषरहित करि स्वामी, दु:ख मेटहु अंतरजामी॥

इंद्रादिक पद नहिं चाहूँ, विषयनि में नाहिं लुभाऊँ।
रागादिक दोष हरीजै, परमातम निज-पद दीजै॥

दोषरहित जिन देवजी, निजपद दीज्यो मोय।
सब जीवन को सुख बढ़ै, आनंद मंगल होय॥

अनुभव मानिक पारखी, ‘जौहरि’ आप जिनंद।
यही वर मोहि दीजिए, चरण-सरण आनंद ॥

जानवर कौन ???

मधु एक बकरी थी, जो की माँ बनने वाली थी। माँ बनने से पहले ही मधू ने भगवान् से दुआएं मांगने शुरू कर दी। कि “हे भगवान् मुझे बेटी देना बेटा नही”। पर किस्मत को ये मन्जूर ना था, मधू ने एक बकरे को जन्म दिया, उसे देखते ही मधू रोने लगी। साथ की बकरियां मधू के रोने की वजह जानती थी, पर क्या कहती। माँ चुप हो  गई और अपने बच्चे को चाटने लगी। दिन बीत ते चले गए और माँ के दिल मे अपने बच्चे के लिए प्यार उमड़ता चला गया। धीरे- धीरे माँ अपने बेटे में सारी दुनियाँ को भूल गई, और भूल गई भविष्य की उस सच्चाई को  जो एक दिन सच होनी थी। मधू रोज अपने बच्चे को चाट कर दिन की शुरूआत करती, और उसकी रात बच्चे से चिपक कर सो कर ही होती।

एक दिन बकरी के मालिक के घर बेटे जन्म लिया। घर में आते मेहमानो और पड़ोसियों की भीड़ देख मधू बकरी ने साथी बकरी से पूछा “बहन क्या हुआ आज बहुत भीड़ है इनके घर पर” ये सुन साथी बकरी ने कहा की “अरे हमारे मालिक के घर बेटा हुआ है, इसलिए चहल पहल है” बकरी मालिक के लिए बहुत खुश हुई आैर उसके बेटे को बहुत दुआएं दी।

 फिर मधू अपने बच्चे से चिपक कर सो गई। मधू सो ही रही थी कि तभी उसके पास एक आदमी आया, सारी बकरियां डर कर सिमट गई, मधू ने भी अपने बच्चे को खुद से चिपका लिया। तभी उस आदमी ने मधू के बेटे को पकड़ लिया और  ले जाने लगा। मधू बहुत चिल्लाई पर उसकी एक ना सुनी गई, बच्चे को बकरियां जहाँ बंधी थी उसके सामने वाले कमरे में ले जाया गया।

बच्चा बहुत चिल्ला रहा था, बुला रहा था अपनी माँ को, मधू भी रस्सी को खोलने के लिए पूरे पूरे पाँव रगड़ दिए पर रस्सी ना खुली। थोडी देर तक बच्चा चिल्लाया पर उसके बाद बच्चा चुप हो गया, अब उसकी आवाज नही आ रही थी।

 मधू जान चुकी थी केे बच्चे के साथ क्या हुआ है, पर वह फिर भी अपने बच्चे के लिए अँख बंद कर दुआएं मांगती रही। पर अब देर हो चुकी थी बेटे का सर धड़ से अलग कर दिया गया था। बेटे का सर मां के सामने पड़ा था, आज भी बेटे की नजर माँ की तरफ थी, पर आज वह नजरे पथरा चुकी थी, बेटे का मुंह आज भी खुला था, पर उसके मुंह से आज माँ के लिए पुकार नही निकल रही थी, बेटे का कटा सिर सामने पडा था माँ उसे आखरी बार चूम भी नही पा रही थी इस वजह से एक आँख से दस दस आँसू बह रहे थे। बेटे को काट कर उसे पका खा लिया गया। और  माँ देखती रह गई, साथ में बेठी हर बकरियाँ इस घटना से अवगत थी पर कोई कुछ कर भी क्या सकती थी।

 दो  माह बीत चुके थे मधू बेटे के जाने के गम में पहले से आधी हो  चुकी थी, कि तभी एक दिन मालिक अपने बेटे को खिलाते हुए बकरियों के सामने आया, ये देख एक बकरी बोली “ये है वो बच्चा जिसके होने पर तेरे बच्चे को काटा गया” मधू आँखों में आँसू भरे अपने बच्चे की याद में खोई उस मालिक के बच्चे को देखने लगी।

वह बकरी फिर बोली “देख कितना खुश है, अपने बालक को खिला कर, पर कभी ये नही सोचता की हमें भी हमारे बालक प्राण प्रिय होते है, मैं तो कहूं जैसे हम अपने बच्चों के वियोग में तड़प कर जीते है वैसे ही ये भी जिए, इसका पुत्र भी मरे” ये सुनते ही मधू उस बकरी पर चिल्लाई कहा “उस बेगुनाह बालक ने क्या बिगाड़ा है, जो उसे मारने की कहती हो, वो तो अभी धरा पर आया है, ऐसा ना कहो भगवान् उसे लम्बी उम्र दे, क्योंकि एक बालक के मरने से जो पीड़ा होती है मैं उससे अवगत हूँ, मैं नही चाहती जो पीड़ा मुझे हो रही है वो किसी और को हो” ये सुन साथी बकरी बोली कैसी है तू उसने तेरे बालक को मारा और तू फिर भी उसी के बालक को दुआ दे रही है।” मधू हँसी और कहा “हाँ, क्योंकि मेरा दिल एक जानवर का है इंसान का नही।

( कई बार सच समझ नही आता की जानवर असल में है कौन)

***शाकाहारी बनों।

हर जीव के बारे में सोचे।।

खाने से पहले बिरयानी

चीख जीव की सुन लेते।

करुणा के वश में होकर

शाकाहार को चुन लेते।।

जैन धर्म की गणित एक बार जरूर पढ़िए

1- आत्मा 1 होती है

2 – जीव -2

3 – योग

4 – गतियां

5 – पाप

6 – द्रव्य

7 – तत्त्व

8 – कर्म

9 – पदार्थ

10 – धर्म

11 – प्रतिमा

12 – भावना

13 – चारित्र

14 – गुणस्थान

15 – प्रमाद

16 – कषाय

17 – मरण

18 – दोष

19 – जीव समास

20 – प्ररूपना

21 – ओदायिकभाव

22 – परिषह

23 – वर्गना

24 – तीर्थकर

25 – क्रियाए

26 – प्रथव्या

27 – पंचेंद्रियोंके विषय

28 – साधू के मूलगुण

29 – मनुष्योंकी संख्या

29 अंक प्रमाण

30 – णमोकारमंत्र में 30 व्यंजन होते है

31 – प्रथम पटल में 31 पटल है

32 – अन्तराय

33 – सर्वार्थसिद्धि में 33सागर आयु

34 – अतिशय

35 – णमोकारमंत्र में 35 अक्षर होते है

36- आचार्यों के मूलगुण

37 – पाँचवे गुणस्थान में आश्रवद्वार 37 होते है

38 – भगवान् पार्श्वनाथ के समोवशरं में 38 हजार आर्यिकाए थी

39 – तत्वार्थसूत्र के तीसरे अध्याय के सूत्र

40 – भवनवासी

41 – चार आराधनाओ के 41 प्रभेद

42 – तत्वार्थसूत्र के चौथे अध्याय के सूत्र

43 – तीसरे गुणस्थान में आस्रवद्वार 43

44 – कल्याणमंदिर के श्लोक

45 – मनुष्य लोक का विस्तार 45 लाख योजन

46 – अरिहंतों के मुलगुण

47 – घाति या कर्म

48 – भक्तामर में 48 श्लोक है

49 – नरक पटल

50 – सम्यक्त्व के 50 मल

51 – इष्टोपदेश के श्लोक 51 होते हे

52 – नंदीश्वरद्वीप के चैताल्य 52 होते हे

53 – जीव के भाव 53 होते हे

54 – बडे समाधिमरण के छंद 54 होते है

55 – सोलहवे स्वर्ग की देवियो की आयु 55 पल्य होती है

56 – जम्बूद्वीप में नक्षत्र 56 होते है

57 – आस्रव के कुल भेद 57 होते है

58 – द्रव्यसंग्रह मे गाथा 58 होती है

59 – सातवे गुणस्थान मे बंधने वाले कर्म 59 होते है

60 – श्रावकव्रतो के अतिचार 60 होते है

61 – आचार्य, उपाध्याय के कुल मूलगुण 61 होते है

62 – पुद्गल विपाकी कर्म 62 होते है

63 – शलाका पुरुष 63 होते है

64 – ऋद्धियाँ 64 होती है

65 – दारहवे गुणस्थान मे अनुदय कर्म 65 होते है

66 – भगवान महावीर की वाणी नहि खिरने के दिन 66 थे

67 – पाँचवे गुणस्थान मे बंधने वाले कर्म 67 होते है

68 – पुण्यकर्म 68 होते है

69 – सम्मूर्च्छन तिर्यंचों के 69 भेद होते है

70 – ढाई द्वीप की मुख्य नदियाँ 70 होती है

71 – अरिहंत, उपाध्याय परमेष्ठी के मूलगुण 71 होते है

72 – भगवान महावीर की आयु 72 वर्ष थी

73 – कषायमार्गणा मे सातवे गुणस्थान मे उदयकर्म 73 होते है

74 – तत्वसार ग्रन्थ की गाथा 74 होती है

75 – गुण संक्रमण के कर्म 75 होते है

76 – द्वीपकुमार के भवन 76 होते है

77 – भगवान श्रेयांसनाथ के गणधर 77 थे

78 – जीव विपाकी कर्म 78 होते है

79 – अरिहंत, उपाध्याय, सिद्धपरमेष्ठी के कुल मूलगुण 79 होते है

80 – पंचमेरू के चैत्यालय 80 होते है

81 – भगवान शान्तिनाथ जी, कुन्थुनाथ जी और पार्श्वनाथ जी के गणधरो की संख्या मिलाकर 81 हो जाति है

82 – अरिहंत और आचार्य परमेष्ठी के कुल मूलगुण 82 होते है

83 – तत्वार्थसूत्र के आठवे, नवें और दसवें अध्याय के सूत्रो की संख्या मिलाकर 83 हो जाति है

84 – णमोकारमन्त्र से 84 लाख मन्त्र निकलते है

85 – चौदह गुणस्थान मे सत्वकर्म 85 होते है

86 – भगवान सुपार्श्वनाथ जी के समवशरण मे वादी मुनीराज 86 सो थे

87 – भगवान शीतलनाथ जी के गणधर 87 थे

88 – भगवान पुष्पदन्त जी के गणधर 88 थे

89 – आचार्य, उपाध्याय और साधु परमेष्ठी के मूलगुण 89 होते है

90 – जम्बूद्वीप की कुल नदियाँ 90 है

91 – अधोग्रैवेयक के चैताल्य 91 है

92 – सामान्य मनुष्य के चौथे गुणस्थान मे कर्म उदय 92 होते है

93 – नामकर्म के भेद 93 होते है

94 – भगवान चन्द्रप्रभ जी के एक कम 94 गणधर थे

95 – भगवान सुपार्श्वनाथ जी के 95 गणधर थे

96 – चक्रवर्ती की 96 हजार रानीयाँ होती है

97 – कुभोगभुमियाँ एक कम 97 होती है

98 – जीव समास के 98 भेद है

99 – सुमेरू पर्वत पृथ्वी से 99 हजार योजन ऊँचा-

100-इंद्रो की कुल संख्या 100 होती है।

ये है जैन धर्म की गिनती।।।।

जैन धर्म की 16 महासतिया

1.ब्राह्मी-

     ३ लाख साध्वियो का नेतृत्व करने वाली इस अवसर्पिणी काल की प्रथम साध्वीजी । ब्राह्मी आदि १८ लिपि सीखनेवाली । केवल्य और मोक्ष पाया । सुमंगला  एवम ऋषभदेव की पुत्री ।

2.सुन्दरी-

     ६० हजार वर्ष तक आयम्बिल का उग्र तप करनेवाली । सुनन्दा एवम ऋषभदेव की पुत्री । बहेन ब्राह्मी के साथ भाई बाहुबलीजी को अभिमान रूपी हाथी पर से उतारा ।

3.चंदनबाला-

    प्रभु महावीर की ३६ हजार साध्वीयो में प्रथम स्थान को अलंकृत करनेवाली सध्विजी । कर्म सत्ता से दुखो की वर्षा से बहार आकर चन्दन की तरह सुवास बढाई ।

4.राजिमती-

     तोरण से रथ वापस लेके जानेवाले नेमकुमार का पथ अनुसरण कर सयंम ग्रहण किया । केवलज्ञान मोक्ष पाया ।

5.द्रोपदी-

     पूर्व जन्म की गलती से पाच पुरुष की पत्नी बनी। अंधे के पुत्र अंधे उपहास में बोले शब्द से महाभारत का सर्जन हुआ।शील सम्पन्ता के कारण चीरहरण के समय लाज बचाई ।

6.कौशल्या-

     राम का वनवास गमन की बात सुनकर भी केकेयी के प्रति दुरभाव नहीं लाई, अपने कर्मो का दोष दिया । राम को सदभावना रखने की प्रेरणा दी ।

7.मृगावती-

       महाराजा चेटक की पुत्री राजा शतानीक की रानी की न्रमता अनुपम थी । वीर की देशना सुनकर विलम्ब आने पर चंदनबाला का ठपका सुनकर पश्चाताप करते हुए केवलज्ञान पाया । गुरु को भी केवलज्ञान की भेट दी ।

8.सुलसा-

     अनागत चोविशी में १५ वे तीर्थंकर निर्मम के नाम से बनने वाली महासती ।

9.सीता-

      जनक राजा की शीलवती पुत्री । रामजी के साथ वनवास स्वीकार किया । रावण के सान्निध्य में भी शील की रक्षा की ।

10.सुभद्रा-

      बोद्ध परिवार में शादी होने पर भी जैनत्व के संस्कार बनाये रखे । सासु द्वारा लगे कलंक को शासनदेवी ने मुक्त किया ।

11.शिवा सती-

     चेटक राजा की पुत्री। चंडप्रधोत राजा की पत्नी। लावण्य से मोहित मंत्री की अनुचित प्रार्थना ठुकराई । नगर में फैला अग्नि का उपद्रव आप द्वारा जल छिडकने से शांत हुआ ।

12.कुंती-

     विपत्ति के समय पुत्रो का साथ दिया। पुत्रो और पुत्र वधुओ के साथ सयंम ग्रहण कर शिद्धाचल पर मोक्ष पाया ।

13.शीलवती-

     चार मंत्रियो द्वारा अनुचित मांगनी को चतुराई से अपने शील की रक्षा की। वासना के भूखो को सबक भी सिखाया ।

14.दमयंती-

     राजा नल द्वारा सब जुए में हरने के बाद उनके साथ वन में गए वहा पति ने अकेला छोड़ा तो भो १२ वर्ष तक धर्म का विस्मरण किया ।

15 .पुष्पचुला-

     सगे भाई से कर्मवश अनिच्छ्नीय सम्बन्ध बंधे । पुण्योदय से अर्निकापुत्र आचार्य की वाणी से वेराग्य हुआ । वृद्ध आचार्यकी सेवा कर केवलज्ञान पाया ।

16.प्रभावती-

     चेटक राजा की पुत्री एवम उदायन राजा की रानी। दीक्षा ली । ६ मास दीक्षा पालन कर स्वर्ग सीधाई। राजा को प्रतिबोध किया ।

श्री श्रेयान्सनाथ चालीसा

श्री श्रेयान्सनाथ चालीसा

 

निज मन में करके स्थापित, पंच परम परमेष्ठि को ।

लिखूँ श्रेयान्सनाथ – चालीसा, मन में बहुत ही हर्षित हो ।।

जय श्रेयान्सनाथ श्रुतज्ञायक हो, जय उत्तम आश्रय दायक हो ।।

माँ वेणु पिता विष्णु प्यारे, तुम सिहंपुरी में अवतारे ।।

जय ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी प्यारी, शुभ रत्नवृष्टि होती भारी ।।

जय गर्भकत्याणोत्सव अपार, सब देव करें नाना प्रकार ।।

जय जन्म जयन्ती प्रभु महान, फाल्गुन एकादशी कृष्ण जान ।।

जय जिनवर का जन्माभिषेक, शत अष्ट कलश से करें नेक ।।

शुभ नाम मिला श्रेयान्सनाथ, जय सत्यपरायण सद्यजात ।।

निश्रेयस मार्ग के दर्शायक, जन्मे मति- श्रुत- अवधि धारक ।।

आयु चौरासी लक्ष प्रमाण, तनतुंग धनुष अस्सी मंहान ।।

प्रभु वर्ण सुवर्ण समान पीत, गए पूरब इवकीस लक्ष बीत ।।

हुआ ब्याह महा मंगलकारी, सब सुख भोगों आनन्दकारी ।।

जब हुआ ऋतु का परिवर्तन, वैराग्य हुआ प्रभु को उत्पन्न ।।

दिया राजपाट सुत ‘श्रेयस्कर’, सब तजा मोह त्रिभुवन भास्कर ।।

सुर लाए “विमलप्रभा’ शिविका, उद्यान ‘मनोहर’ नगरी का ।।

वहाँ जा कर केश लौंच कीने, परिग्रह बाह्मान्तर तज दीने ।।

गए शुद्ध शिला तल पर विराज, ऊपर रहा “तुम्बुर वृक्ष’ साज ।।

किया ध्यान वहाँ स्थिर होकर, हुआ जान मन:पर्यय सत्वर ।।

हुए धन्य सिद्धार्थ नगर भूप, दिया पात्रदान जिनने अनूपा ।।

महिमा अचिन्त्य है पात्र दान, सुर करते पंच अचरज महान ।।

वन को तत्काल ही लोट गए, पूरे दो साल वे मौन रहे ।।

आई जब अमावस माघ मास, हुआ केवलज्ञान का सुप्रकाश ।।

रचना शुभ समवशरण सुजान, करते धनदेव-तुरन्त आन ।।

प्रभु दिव्यध्वनि होती विकीर्ण, होता कर्मों का बन्ध क्षीण ।।

“उत्सर्पिणी–अवसर्पिणी विशाल, ऐसे दो भेद बताये काल ।।

एकसौ अड़तालिस बीत जायें, तब हुण्डा- अवसर्पिणी कहाय ।।

सुरवमा- सुरवमा है प्रथम काल, जिसमें सब जीव रहें खुशहाल ।।

दूजा दिखलाते ‘सुखमा’ काल, तीजा “सुखमा दुरवमा’ सुकाल ।।

चौथा ‘दुखमा-सुखमा’ सुजान, ‘दूखमा’ है पंचमकाल मान ।।

‘दुखमा- दुखमा’ छट्टम महान, छट्टम-छट्टा एक ही समान ।।

यह काल परिणति ऐसी ही, होती भरत- ऐरावत में ही ।।

रहे क्षेत्र विदेह में विद्यमान, बस काल चतुर्थ ही वर्तमान ।।

सुन काल स्वरुप को जान लिया, भवि जीवों का कल्याण हुआ ।।

हुआ दूर- दूर प्रभु का विहार, वहाँ दूर हुआ सब शिथिलाचार ।।

फिर गए प्रभु गिरिवर सम्मेद, धारें सुयोग विभु बिना खेद ।।

हुई पूर्णमासी श्रावण शुक्ला, प्रभु को शाश्वत निजरूप मिला ।।

पूजें सुर “संकुल कूट’ आन, निर्वाणोत्सव करते महान ।।

प्रभुवर के चरणों का शरणा, जो भविजन लेते सुखदाय ।।

उन पर होती प्रभु की करुणा, ‘अरुणा’ मनवाछिंत फल पाय ।।

जाप: – ॐ ह्रीं अर्हं श्रेयान्सनाथाय नभः

श्री अजितनाथ चालीसा

श्री आदिनाथ को शिश नवा कर, माता सरस्वती को ध्याय ।

शुरू करूँ श्री अजितनाथ का, चालीसास्व – सुखदाय ।।

जय श्री अजितनाथ जिनराज । पावन चिह्न धरे गजराज ।।

नगर अयोध्या करते राज । जितराज नामक महाराज ।।

विजयसेना उनकी महारानी । देखे सोलह स्वप्न ललामी ।।

दिव्य विमान विजय से चयकर । जननी उदर बसे प्रभु आकर ।।

शुक्ला दशमी माघ मास की । जन्म जयन्ती अजित नाथ की ।।

इन्द्र प्रभु को शीशधार कर । गए सुमेरू हर्षित हो कर ।।

नीर शीर सागर से लाकर । न्हवन करें भक्ति में भरकर ।।

वस्त्राभूषण दिव्य पहनाए । वापस लोट अयोध्या आए ।।

अजित नाथ की शोभा न्यारी । वर्ण स्वर्ण सम कान्तिधारी ।।

बीता बचपन जब हितकारी । हुआ ब्याह तब मंगलकारी ।।

कर्मबन्ध नही हो भोगो में । अन्तदृष्टि थी योगो में ।।

चंचल चपला देखी नभ में । हुआ वैराग्य निरन्तर मन में ।।

राजपाट निज सुत को देकर । हुए दिगम्बर दीक्षा लेकर ।।

छः दिन बाद हुआ आहार । करे श्रेष्ठि ब्रह्मा सत्कार ।।

किये पंच अचरज देवो ने । पुण्योपार्जन किया सभी ने ।।

बारह वर्ष तपस्या कीनी । दिव्यज्ञान की सिद्धि नवीनी ।।

धनपति ने इन्द्राज्ञा पाकर । रच दिया समोशरण हर्षाकर ।।

सभा विशाल लगी जिनवर की । दिव्यध्वनि खिरती प्रभुवर की ।।

वाद विवाद मिटाने हेतु । अनेकांत का बाँधा सेतु ।।

है सापेक्ष यहा सब तत्व । अन्योन्याश्रित है उन सत्व ।।

सब जिवो में है जो आतम । वे भी हो सक्ते शुद्धात्म ।।

ध्यान अग्नि का ताप मिले जब । केवल ज्ञान की की ज्योति जले तब ।।

मोक्ष मार्ग तो बहुत सरल है । लेकिन राहीहुए विरल है ।।

हीरा तो सब ले नही पावे । सब्जी भाजी भीङ धरावे ।।

दिव्यध्वनि सुन कर जिनवर की । खिली कली जन जन के मन की ।।

प्राप्ति कर सम्यग्दर्शन की । बगिया महकी भव्य जनो की ।।

हिंसक पशु भी समता धारे । जन्म जन्म का का वैर निवारे ।।

पूर्ण प्रभावना हुई धर्म की । भावना शुद्ध हुई भविजन की ।।

दुर दुर तक हुआ विहार । सदाचार का हुआ प्रचार ।।

एक माह की उम्र रही जब । गए शिखर सम्मेद प्रभु तब ।।

अखण्ङ मौन मुद्रा की धारण । कर्म अघाती हेतु निवारण ।।

शुक्ल ध्यान का हुआ प्रताप । लोक शिखर पर पहुँचे आप ।।

सिद्धवर कुट की भारी महिमा । गाते सब प्रभु के गुण – गरिमा ।।

विजित किए श्री अजित ने । अष्ट कर्म बलवान ।।

निहित आत्मगुण अमित है , अरूणा सुख की खान ।।