श्री शान्तिनाथ चालीसा

शान्तिनाथ भगवान का, चालीसा सुखकार ।।
मोक्ष प्राप्ति के लिय, कहूँ सुनो चितधार ।।
चालीसा चालीस दिन तक, कह चालीस बार ।।
बढ़े जगत सम्पन, सुमत अनुपम शुद्ध विचार ।।

शान्तिनाथ तुम शान्तिनायक, पण्चम चक्री जग सुखदायक ।।
तुम ही सोलहवे हो तीर्थंकर, पूजें देव भूप सुर गणधर ।।
पत्र्चाचार गुणोके धारी, कर्म रहित आठों गुणकारी ।।
तुमने मोक्ष मार्ग दर्शाया, निज गुण ज्ञान भानु प्रकटाया ।।

स्याद्वाद विज्ञान उचारा, आप तिरे औरन को तारा ।।
ऎसे जिन को नमस्कार कर, चढूँ सुमत शान्ति नौका पर ।।
सूक्ष्म सी कुछ गाथा गाता, हस्तिनापुर जग विख्याता ।।
विश्व सेन पितु, ऐरा माता, सुर तिहुं काल रत्न वर्षाता ।।

साढे दस करोड़ नित गिरते, ऐरा माँ के आंगन भरते ।।
पन्द्रह माह तक हुई लुटाई, ले जा भर भर लोग लुगाई ।।
भादों बदी सप्तमी गर्भाते, उतम सोलह स्वप्न आते ।।
सुर चारों कायों के आये, नाटक गायन नृत्य दिखाये ।।

सेवा में जो रही देवियाँ, रखती खुश माँ को दिन रतियां ।।
जन्म सेठ बदी चौदश के दिन, घन्टे अनहद बजे गगन घन ।।
तीनों ज्ञान लोक सुखदाता, मंगल सकल हर्ष गुण लाता ।।
इन्द्र देव सुर सेवा करते, विद्या कला ज्ञान गुण बढ़ते ।।

अंग-अंग सुन्दर मनमोहन, रत्न जड़ित तन वस्त्राभूषण ।।
बल विक्रम यश वैभव काजा, जीते छहों खण्ड के राजा ।।
न्यायवान दानी उपचारी, प्रजा हर्षित निर्भय सारी ।।
दीन अनाथ दुखी नही कोई, होती उत्तम वस्तु वोई ।।

ऊँचे आप आठ सौ गज थे, वदन स्वर्ण अरू चिन्ह हिरण थे ।।
शक्ति ऐसी थी जिस्मानी, वरी हजार छानवें रानी ।।
लख चौरासी हाथी रथ थे, घोड़े करोङ अठारह शुभ थे ।।
सहस पचास भूप के राजन, अरबो सेवा में सेवक जन ।।

तीन करोड़ थी सुंदर गईयां, इच्छा पूर्ण करें नौ निधियां ।।
चौदह रतन व चक्र सुदर्शन, उतम भोग वस्तुएं अनगिन ।।
थी अड़तालीस कोङ ध्वजायें, कुंडल चंद्र सूर्य सम छाये ।।
अमृत गर्भ नाम का भोजन, लाजवाब ऊंचा सिंहासन ।।

लाखो मंदिर भवन सुसज्जित, नार सहित तुम जिसमें शोभित ।।
जितना सुख था शांतिनाथ को, अनुभव होता ज्ञानवान को ।।
चलें जिव जो त्याग धर्म पर, मिले ठाठ उनको ये सुखकर ।।
पचीस सहस्त्रवर्ष सुख पाकर, उमङा त्याग हितंकर तुमपर ।।

वैभव सब सपने सम माना, जग तुमने क्षणभंगुर जाना ।।
ज्ञानोदय जो हुआ तुम्हारा, पाये शिवपुर भी संसारा ।।
कामी मनुज काम को त्यागें, पापी पाप कर्म से भागे ।।
सुत नारायण तख्त बिठाया, तिलक चढ़ा अभिषेक कराया ।।

नाथ आपको बिठा पालकी, देव चले ले राह गगन की ।।
इत उत इन्दर चँवर ढुरवें, मंगल गाते वन पहुँचावें ।।
भेष दिगम्बर अपना कीना, केश लोच पन मुष्ठी कीना ।।
पूर्ण हुआ उपवास छटा जब, शुद्धाहार चले लेने तब ।।

कर तीनों वैराग चिन्तवन, चारों ज्ञान किये सम्पादन ।।
चार हाथ मग चलतें चलते, षट् कायिक की रक्षा करते ।।
मनहर मीठे वचन उचरते, प्राणिमात्र का दुखड़ा हरते ।।
नाशवान काया यह प्यारी, इससे ही यह रिश्तेदारी ।।

इससे मात पिता सुत नारी, इसके कारण फिरो दुखारी ।।
गर यह तन प्यारा सगता, तरह तरह का रहेगा मिलता ।।
तज नेहा काया माया का , हो भरतार मोक्ष दारा का ।।
विषय भोग सब दुख का कारण, त्याग धर्म ही शिव के साधन ।।

निधि लक्ष्मी जो कोई त्यागे, उसके पीछे पीछे भागे ।।
प्रेम रूप जो इसे बुलावे, उसके पास कभी नही आवे ।।
करने को जग का निस्तारा, छहों खण्ड का राज विसारा ।।
देवी देव सुरा सर आये, उत्तम तप कल्याण मनाये ।।

पूजन नृत्य करें नत मस्तक, गाई महिमा प्रेम पूर्वक ।।
करते तुम आहार जहाँ पर, देव रतन वर्षाते उस घर ।।
जिस घर दान पात्र को मिलता, घर वह नित्य फूलता-फलता ।।
आठों गुण सिद्धों के ध्याकर, दशों धर्म चित काय तपाकर ।।

केवल ज्ञान आपने पाया, लाखों प्राणी पार लगाया ।।
समवशरण में धंवनि खिराई, प्राणी मात्र समझ में आई ।।
समवशरण प्रभु का जहाँ जाता, कोस चार सौ तक सुख पाता ।।
फूल फलादिक मेवा आती, हरी भरी खेती लहराती ।।

सेवा में छत्तिस थे गणधार, महिमा मुझसे क्या हो वर्णन ।।
नकुल सर्प मृग हरी से प्राणी, प्रेम सहित मिल पीते पानी ।।।
आप चतुर्मुख विराजमान थे, मोक्ष मार्ग को दिव्यवान थे ।।
करते आप विहार गगन में अन्तरिक्ष थे समवशरण में ।।

तीनो जगत आनन्दित किने, हित उपदेश हजारो दीने ।।
पौने लाख वर्ष हित कीना, उम्र रही जब एक महीना ।।
श्री सम्मेद शिखर पर आये, अजर अमर पद तुमनेे पाये ।।
निष्पृह कर उद्धार जगत के, गये मोक्ष तुम लाख वर्ष के ।।

आंक सकें क्या छवी ज्ञान की, जोत सुर्य सम अटल आपकी ।।
बहे सिन्धु सम गुण की धारा, रहे सुमत चित नाम तुम्हारा ।।

नित चालीस ही बार पाठ करें चालीस दिन ।
खेये सुगन्ध अपार, शांतिनाथ के सामने ।।
होवे चित प्रसन्न, भय चिंता शंका मिटे ।
पाप होय सब हन्न, बल विद्या वैभव बढ़े ।।

श्री पुष्पदन्त चालीसा

दुख से तप्त मरूस्थल भव में, सघन वृक्ष सम छायाकार ।।

पुष्पदन्त पद – छत्र – छाँव में हम आश्रय पावे सुखकार ।।

जम्बूद्विप के भारत क्षेत्र में, काकन्दी नामक नगरी में ।।

राज्य करें सुग्रीव बलधारी, जयरामा रानी थी प्यारी ।।

नवमी फाल्गुन कृष्ण बल्वानी, षोडश स्वप्न देखती रानी ।।

सुत तीर्थंकर हर्भ में आएं, गर्भ कल्याणक देव मनायें ।।

प्रतिपदा मंगसिर उजयारी, जन्मे पुष्पदन्त हितकारी ।।

जन्मोत्सव की शोभा नंयारी, स्वर्गपूरी सम नगरी प्यारी ।।

आयु थी दो लक्ष पूर्व की, ऊँचाई शत एक धनुष की ।।

थामी जब राज्य बागडोर, क्षेत्र वृद्धि हुई चहुँ ओर ।।

इच्छाएँ उनकी सीमीत, मित्र पर्भु के हुए असीमित ।।

एक दिन उल्कापात देखकर, दृष्टिपाल किया जीवन पर ।।

स्िथर कोई पदार्थ न जग में, मिले न सुख किंचित्  भवमग में ।।

ब्रह्मलोक से सुरगन आए, जिनवर का वैराग्य बढ़ायें।।

सुमति पुत्र को देकर राज, शिविका में प्रभु गए विराज ।।

पुष्पक वन में गए हितकार, दीक्षा ली संगभूप हज़ार ।।

गए शैलपुर दो दिन बाद, हुआ आहार वहाँ निराबाद ।।

पात्रदान से हर्षित होमकर, पंचाश्चर्य करे सुर आकर ।।

प्रभुवर लोट गए उपवन को, तत्पर हुए कर्म- छेदन को ।।

लगी समाधि नाग वृक्ष तल, केवलज्ञान उपाया निर्मल ।।

इन्द्राज्ञा से समोश्रण की, धनपति ने आकर रचना की ।।

दिव्य देशना होती प्रभु की, ज्ञान पिपासा मिटी जगत की ।।

अनुप्रेक्षा द्वादश समझाई, धर्म स्वरूप विचारो भाई ।।

शुक्ल ध्यान की महिमा गाई, शुक्ल ध्यान से हों शिवराई ।।

चारो भेद सहित धारो मन, मोक्षमहल में पहुँचो तत्क्षण ।।

मोक्ष मार्ग दर्शाया प्रभु ने, हर्षित हुए सकल जन मन में ।।

इन्द्र करे प्रार्थना जोड़ कर, सुखद विहार हुआ श्री जिनवर ।।

गए अन्त में शिखर सम्मेद, ध्यान में लीन हुए निरखेद ।।

शुक्ल ध्यान से किया कर्मक्षय, सन्ध्या समय पाया पद आक्षय ।।

अश्विन अष्टमी शुकल महान, मोक्ष कल्याणक करें सुर आन ।।

सुप्रभ कूट की करते पूजा, सुविधि नाथ नाम है दूजा ।।

मगरमच्छ है लक्षण प्रभु का, मंगलमय जीवन था उनका ।।

शिखर सम्मेद में भारी अतिशय, प्रभु प्रतिमा है चमत्कारमय ।।

कलियुग में भी आते देव, प्रतिदिन नृत्य करें स्वयमेव ।।

घुंघरू की झंकार गूंजती, सब के मन को मोहित करती ।।

ध्वनि सुनी हमने कानो से, पूजा की बहु उपमानो से ।।

हमको है ये दृड श्रद्धान, भक्ति से पायें शिवथान ।।

भक्ति में शक्ति है न्यारी, राह दिखायें करूणाधारी ।।

पुष्पदन्त गुणगान से, निश्चित हो कल्याण ।।

हम सब अनुक्रम से मिले, अन्तिम पद निर्वाण ।।

जैन विचार

जैन बंधुओं

-कभी भी माँस-अण्डा नहीं खाना!
-कभी भी शराब नहीं पीना!
-कभी भी जुआ नहीं खेलना!
-कभी भी चमड़े/leather से बने कपड़े,बेल्ट,पर्स आदि का इस्तेमाल नहीं करना!
-कभी भी चोरी नहीं करना!
-कभी भी सिगरेट/cigarette,गुटका,तंबाकू/Tobacco नहीं खाना!
-कभी भी किसी भी स्त्री या अपने माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार नहीं करना!
-कभी भी पटाखे/crackers नहीं फोड़ना!

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-दिखावे में मत उलझना!
-कोशिश हमेशा घर का बना हुआ भोजन
लेने की ही करना!
-घर में प्यार-प्रेम का वातावरण बनाना,बच्चे आप से अपनी दिल की बात करें ऐसा माहौल होना चाहिए घरों में!
-बड़ों का सम्मान हो,उनकी सेवा करना,कोई बात हो तो प्यार से कहना!
-बच्चों को सही-ग़लत की पहचान करना सिखाना,अपने बच्चों को गुरुओं से जोड़ें!
-हर रोज़ घर का हर सदस्य पास वाले जैन धर्म स्थान में जाए!
-गुरु का प्रवचन सुनना,उनके विहार में उनके साथ जाना,उन्हें निर्दोष आहार देना!
-कोई एक नियम तो ऐसा लेना जिसका पूरी ज़िंदगी मन से पालन करो!
-औरों को भी जैन धर्म से जोड़ना!

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“जैन-कुल” मिला है, इसे सार्थक कीजिये”

“”अपने को दुःख होता है,उसमें तो आप कहते हो की मुझे बचाए कोई पर जब आप दूसरों  को दुःख देते हो तो आपको उनका दर्द महसूस नहीं होता!”””
जैसे आप दुःख नहीं चाहते हो, वैसे ही इस संसार में कोई भी जीव दुःख नहीं चाहता, इसलिए अपना जैन धर्म अहिंसा को परम धर्म मानता है!
जय जिनेंद्र

श्री चन्द्रप्रभु चालीसा

वीतराग सर्वज्ञ जिन, जिन वाणी को ध्याय |
लिखने का साहस करुं, चालीसा सिर नाय |1|
देहरे के श्रीचन्द्र को, पूजौं मन वच काय |
ऋद्धि सिद्धि मंगल करें, विघ्न दूर हो जाय |2|
जय श्रीचन्द्र दया के सागर, देहरे वाले ज्ञान उजागर |3|
शांति छवि मूरति अति प्यारी, भेष दिगम्बर धारा भारी |4|
नासा पर है दृष्टि तुम्हारी, मोहनी मूरति कितनी प्यारी |5|
देवों के तुम देव कहावो, कष्ट भक्त के दूर हटावो |6|
समन्तभद्र मुनिवर ने ध्याया, पिंडी फटी दर्श तुम पाया |7|
तुम जग में सर्वज्ञ कहावो, अष्टम तीर्थंकर कहलावो |8|
महासेन के राजदुलारे, मात सुलक्षणा के हो प्यारे |9|
चन्द्रपुरी नगरी अति नामी, जन्म लिया चन्द्र-प्रभु स्वामी |10|
पौष वदी ग्यारस को जन्मे, नर नारी हरषे तब मन में |11|
काम क्रोध तृष्णा दुखकारी, त्याग सुखद मुनि दीक्षा धारी |12|
फाल्गुन वदी सप्तमी भाई, केवल ज्ञान हुआ सुखदाई |13|
फिर सम्मेद शिखर पर जाके, मोक्ष गये प्रभु आप वहां से|14|
लोभ मोह और छोड़ी माया, तुमने मान कषाय नसाया |15|
रागी नहीं, नहीं तू द्वेषी, वीतराग तू हित उपदेशी |16|
पंचम काल महा दुखदाई, धर्म कर्म भूले सब भाई |17|
अलवर प्रान्त में नगर तिजारा, होय जहां पर दर्शन प्यारा|18|
उत्तर दिशि में देहरा माहीं, वहां आकर प्रभुता प्रगटाई |19|
सावन सुदि दशमि शुभ नामी, प्रकट भये त्रिभुवन के स्वामी20|
चिह्न चन्द्र का लख नर नारी, चंद्रप्रभु की मूरती मानी |21|
मूर्ति आपकी अति उजयाली, लगता हीरा भी है जाली |22|
अतिशय चन्द्र प्रभु का भारी, सुनकर आते यात्री भारी |23|
फाल्गुन सुदी सप्तमी प्यारी, जुड़ता है मेला यहां भारी |24|
कहलाने को तो शशि धर हो, तेज पुंज रवि से बढ़कर हो |25|
नाम तुम्हारा जग में सांचा, ध्यावत भागत भूत पिशाचा |26|
राक्षस भूत प्रेत सब भागें, तुम सुमिरत भय कभी न लागे|27|
कीर्ति तुम्हारी है अति भारी, गुण गाते नित नर और नारी|28|
जिस पर होती कृपा तुम्हारी, संकट झट कटता ही भारी |29|
जो भी जैसी आश लगाता, पूरी उसे तुरत कर पाता |30|
दुखिया दर पर जो आते हैं, संकट सब खो कर जाते हैं |31|
खुला सभी हित प्रभु द्वार है, चमत्कार को नमस्कार है |32|
अन्धा भी यदि ध्यान लगावे, उसके नेत्र शीघ्र खुल जावें |33|
बहरा भी सुनने लग जावे, पगले का पागलपन जावे |34|
अखंड ज्योति का घृत जो लगावे संकट उसका सब कट जावे |35|
चरणों की रज अति सुखकारी, दुख दरिद्र सब नाशनहारी |36|
चालीसा जो मन से ध्यावे, पुत्र पौत्र सब सम्पति पावे |37|
पार करो दुखियों की नैया, स्वामी तुम बिन नहीं खिवैया |38|
प्रभु मैं तुम से कुछ नहिं चाहूं दर्श तिहारा निश दिन पाऊँ39|
करुं वन्दना आपकी, श्रीचन्द्र प्रभु जिनराज |
जंगल में मंगल कियो, रखो ‘सुरेश’ की लाज |40|

अर्घावतारन असिप्रहारन में सदा समता धरन

महाराज श्रेणिक ने धर्म विद्वेषवश यशोधर मुनिराज के गले में एक मरा हुआ सर्प डाल दिया और राजभवन में जाकर चेलना को यह समाचार सुनाया। यह दुखद समाचार सुनते ही अत्यन्त ही दुखी होकर चेलना विलाप करने लगी। यह देखकर श्रेणिक ने कहा – देवी! इसमें रोने और दुखी होने की क्या बात है? उन्होंने तो कभी का उसे निकालकर फेंक दिया होगा।

यह सुनकर चेलना बोल उठी – राजन्! अनर्थ! घोर अनर्थ! तुमने जो उनको दुख देने का प्रयत्न किया है, वीतरागी दिगम्बर साधु उस दुख से बचने के लिये उसे निकालकर कभी नहीं फेंक सकते क्योंकि उनको सुख दुख की सभी सामग्री एक समान है। वे इसे दुख ही नहीं मानते हैं। इस बात का विश्वास करने के लिये राजा रानी मुनिराज यशोधर के पास पहुँचे। वहाँ पहुँच कर देखा तो  लाखों चीटियों ने सारे बदन में काट-काटकर फुटबॉल जैसा फुला दिया है। चेलना ने जमीन पर चीनी डालकर चीटियों को उतारा और साँप निकलवाकर अलग किया। उपसर्ग दूर हुआ समझकर मुनिराज ने अपनी समाधि खोली। राजा रानी ने मुनिराज के चरणों मे नमस्कार किया। मुनिराज के सामने दोनों शत्रु मित्र होते हुए भी दोनों को समान रूप से सहर्ष शुभाशीर्वाद दिया। “तुम दोनों का कल्याण हो” राजा श्रेणिक इस महान् वीतरागी संत का अपूर्व समताभाव देखकर चरणों गिर क्षमा याचना करने लगा। धन्य हैं रत्नत्रयधारी वीतरागी सन्तों की समतादृष्टि! इस समताभाव से श्रेणिक इतने प्रभावित हुये कि वे जैन धर्म के दृढ़श्रद्धानी बन गये। उन्होंने भगवान महावीर स्वामी के समवसरण में क्षायिक  सम्यक्दर्षन प्राप्त कर  तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया। वे उत्सर्पिणी काल के महापद्म नामक प्रथम तीर्थंकर बनकर स्वयं संसार से मुक्त होगे और अनन्तजीवों के आत्मोद्धार में आदर्श बनेंगे।

सच्ची भविष्यवाणी

एक सेठ बहुत धनवान थे। उन्हें धन का बहुत घमंड था। एक दिन वे मुनिराज को पास पहुंचे और नमस्कार कर कहने लगे, स्वामिन्! आप तो विशेष ज्ञानी हैं, कुछ भविष्य की भी जानते होंगे।

मुनिराज ने कहा – मैं तो भविष्यवक्ता हूँ। मेरी वाणी कोई भी क्या, सर्वज्ञ भी अन्यथा सिद्ध नहीं कर सकते।

सेठ – बोले प्रभु, तब मेरा भविष्य बतलाने की महती कृपा करे।

मुनिराज ने कहा- मेरी सच्ची भविष्यवाणी सुनिये -आप यह सब ठाट बाट छोड़कर अवश्य मरेंगे। इसे कोई अन्यथा नहीं कर सकता, यह परम सत्य है। सेठ अवाक रह गया।

जो बिन ज्ञान क्रिया अवगाहें

राजा को अपना बाग बहुत प्रिय था। उसने परदेश जाते समय राजकुमार को बाग की देख -रेख सोंप दी। राजकुमार ने माली से कहा – इन पेड़ो के पत्तों को ऐसे स्वच्छ साफ रखो कि ये चमकते रहें। इनकी रोज धुलाई करो। राजकुमार के सामने उनकी रोज धुलाई होने लगी किन्तु गमले के सभी पोधे सुखने लगे। राजा ने आकर कहा-राजकुमार! तुमने इन पौधो को क्यों सुखा डाला? राजकुमार ने कहा – मैंने तो इनकी रोज सफाई कराई। राजा ने कहा – तुमने तो वैसे ही मूर्खता की कि जैसे लोग क्रिया काण्ड करते रहते हैं, मूल आत्म-स्वभाव की तरफ देखते ही नहीं ।

श्री पद्मप्रभुजी चालीसा

शीश नवा अर्हंत को सिद्धन करुं प्रणाम |

उपाध्याय आचार्य का ले सुखकारी नाम ||
सर्व साधु और सरस्वती जिन मन्दिर सुखकार |

पद्मपुरी के पद्म को मन मन्दिर में धार ||
जय श्रीपद्मप्रभु गुणधारी, भवि जन को तुम हो हितकारी |
देवों के तुम देव कहाओ, पाप भक्त के दूर हटाओ ||

तुम जग में सर्वज्ञ कहाओ, छट्टे तीर्थंकर कहलाओ |
तीन काल तिहुं जग को जानो, सब बातें क्षण में पहचानो ||

वेष दिगम्बर धारणहारे, तुम से कर्म शत्रु भी हारे |
मूर्ति तुम्हारी कितनी सुन्दर, दृष्टि सुखद जमती नासा पर ||

क्रोध मान मद लोभ भगाया, राग द्वेष का लेश न पाया |
वीतराग तुम कहलाते हो, ; सब जग के मन को भाते हो ||

कौशाम्बी नगरी कहलाए, राजा धारणजी बतलाए |
सुन्दरि नाम सुसीमा उनके, जिनके उर से स्वामी जन्मे ||

कितनी लम्बी उमर कहाई, तीस लाख पूरब बतलाई |
इक दिन हाथी बंधा निरख कर, झट आया वैराग उमड़कर ||

कार्तिक वदी त्रयोदशी भारी, तुमने मुनिपद दीक्षा धारी |
सारे राज पाट को तज के, तभी मनोहर वन में पहुंचे ||

तप कर केवल ज्ञान उपाया, चैत सुदी पूनम कहलाया |
एक सौ दस गणधर बतलाए, मुख्य व्रज चामर कहलाए ||

लाखों मुनि आर्यिका लाखों, श्रावक और श्राविका लाखों |
संख्याते तिर्यच बताये, देवी देव गिनत नहीं पाये ||

फिर सम्मेदशिखर पर जाकर, शिवरमणी को ली परणा कर|
पंचम काल महा दुखदाई, जब तुमने महिमा दिखलाई ||

जयपुर राज ग्राम बाड़ा है, स्टेशन शिवदासपुरा है |
मूला नाम जाट का लड़का, घर की नींव खोदने लागा ||

खोदत-खोदत मूर्ति दिखाई, उसने जनता को बतलाई |
चिन्ह कमल लख लोग लुगाई, पद्म प्रभु की मूर्ति बताई ||

मन में अति हर्षित होते हैं, अपने दिल का मल धोते हैं |
तुमने यह अतिशय दिखलाया, भूत प्रेत को दूर भगाया ||

भूत प्रेत दुःख देते जिसको, चरणों में लेते हो उसको |
जब गंधोदक छींटे मारे, भूत प्रेत तब आप बकारे ||

जपने से जब नाम तुम्हारा, भूत प्रेत वो करे किनारा |
ऐसी महिमा बतलाते हैं, अन्धे भी आंखे पाते है ||

प्रतिमा श्वेत-वर्ण कहलाए, देखत ; ही हिरदय को भाए |
ध्यान तुम्हारा जो धरता है, इस भव से वह नर तरता है ||

अन्धा देखे, गूंगा गावे, लंगड़ा पर्वत पर चढ़ जावे |
बहरा सुन-सुन कर खुश होवे, जिस पर कृपा तुम्हारी होवे||

मैं हूं स्वामी दास तुम्हारा, मेरी नैया कर दो पारा |
चालीसे को ‘चन्द्र’ बनावे, पद्म प्रभु को शीश नवावे ||

सोरठाः-

नित चालीसहिं बार, पाठ करे चालीस दिन |
खेय सुगन्ध अपार, पद्मपुरी में आय के ||

होय कुबेर समान, जन्म दरिद्री होय जो |
जिसके नहिं सन्तान, नाम वंश जग में चले ||

पूज्य- शरीर या गुण

एक बार एक द्वेषी मनुष्य ने अपने शिष्यों से कहा- “ये जैन मुनि कितने गन्दें रहते हैं। कभी नहाते नहीं। इनसे तो सदा दूर ही रहना चाहिये”। किसी जैन भाई ने यह सुना। वे उसके पास पहुंचे और बोले- “महानुभाव !गाय कभी नहाती नहीं है और भेंस सदा पानी में ही पड़ रहती है। बताइये, इन दोंनो में  पवित्र कौन है?  आप किसे पूज्य मानते हैं?” वास्तव में संगति करने के योग्य वह होते हैं, जिनका मन और जीवन पवित्र होता है। तन की पवित्रता से आत्मा का कोई संबंध नहीं है। मन चंगा तो कठोती में गंगा। बेचारा वह मनुष्य अब क्या जवाब दे!

श्री सुमतिनाथ चालीसा

श्री सुमतिनाथ का करूणा निर्झर, भव्य जनो तक पहूँचे झर – झर ।।

नयनो में प्रभु की छवी भऱ कर, नित चालीसा पढे सब घर – घर ।।

जय श्री सुमतिनाथ भगवान, सब को दो सदबुद्धि – दान ।।

अयोध्या नगरी कल्याणी, मेघरथ राजा मंगला रानी ।।

दोनो के अति पुण्य पर्रजारे, जो तीर्थंकर सुत अवतारे ।।

शुक्ला चैत्र एकादशी आई, प्रभु जन्म की बेला आई ।।

तीन लोक में आनंद छाया, नरकियों ने दुःख भुलाया ।।

मेरू पर प्रभु को ले जा कर, देव न्हवन करते हर्षाकार ।।

तप्त स्वर्ण सम सोहे प्रभु तन, प्रगटा अंग – प्रतयंग में योवन ।।

ब्याही सुन्दर वधुएँ योग, नाना सुखों का करते भोग ।।

राज्य किया प्रभु ने सुव्यवस्थित, नही रहा कोई शत्रु उपस्थित ।।

हुआ एक दिन वैराग्य जब, नीरस लगने लगे भोग सब ।।

जिनवर करते आत्म चिन्तन, लौकान्तिक करते अनुमोदन ।।

गए सहेतुक नावक वन में, दीक्षा ली मध्याह्म समय में ।।

बैसाख शुक्ला नवमी का शुभ दिन, प्रभु ने किया उपवास तीन दिन ।।

हुआ सौमनस नगर विहार, धुम्नधुति ने दिया आहार ।।

बीस वर्ष तक किया तप घोर, आलोकित हुए लोका लोक ।।

एकादशी चैत्र की शुक्ला, धन्य हुई केवल – रवि निकाला ।।

समोशरण में प्रभु विराजे, दृवादश कोठे सुन्दर साजें ।।

दिव्यध्वनि जब खिरी धरा पर, अनहद नाद हुआ नभ उपर ।।

किया व्याख्यान सप्त तत्वो का, दिया द्रष्टान्त देह – नौका का ।।

जीव – अजिव – आश्रव बन्ध, संवर से निर्जरा निर्बन्ध ।।

बन्ध रहित होते है सिद्ध, है यह बात जगत प्रसिद्ध ।।

नौका सम जानो निज देह, नाविक जिसमें आत्म विदह ।।

नौका तिरती ज्यो उदधि में, चेतन फिरता भवोदधि में ।।

हो जाता यदि छिद्र नाव में, पानी आ जाता प्रवाह में ।।

ऐसे ही आश्रव पुद्गल में, तीन योग से हो प्रतीपल में ।।

भरती है नौका ज्यो जल से, बँधती आत्मा पुण्य पाप से ।।

छिद्र बन्द करना है संवर, छोड़ शुभाशुभ – शुद्धभाव धर ।।

जैसे जल को बाहर निकाले, संयम से निर्जरा को पाले ।।

नौका सुखे ज्यों गर्मी से, जीव मुक्त हो ध्यानाग्नि से ।।

ऐसा जान कर करो प्रयास, शाश्वत सुख पाओ सायास ।।

जहाँ जीवों का पुन्य प्रबल था, होता वही विहार स्वयं था ।।

उम्र रही जब एक ही मास, गिरि सम्मेद पे किया निवास ।।

शुक्ल ध्यान से किया कर्मक्षय, सन्धया समय पाया पद अक्षय ।।

चैत्र सुदी एकादशी सुन्दर, पहुँच गए प्रभु मुक्ति मन्दिर ।।

चिन्ह प्रभु का चकवा जान, अविचल कूट पूजे शुभथान ।।

इस असार संसार में , सार नही है शेष ।।

हम सब चालीसा पढे, रहे विषाद न लेश ।।