श्री विमलनाथ चालीसा

सिद्ध अनन्तानन्त नमन कर, सरस्वती को मन में ध्याय ।।
विमलप्रभु क्री विमल भक्ति कर, चरण कमल में शीश नवाय ।।
जय श्री विमलनाथ विमलेश, आठों कर्म किए नि:शेष ।।
कृतवर्मा के राजदुलारे, रानी जयश्यामा के प्यारे ।।
मंगलीक शुभ सपने सारे, जगजननी ने देखे न्यारे ।।
शुक्ल चतुर्थी माघ मास की, जन्म जयन्ती विमलनाथ की ।।
जन्योत्सव देवों ने मनाया, विमलप्रभु शुभ नाम धराया ।।
मेरु पर अभिषेक कराया, गन्धोंदक श्रद्धा से लगाया ।।
वस्त्राभूषण दिव्य पहनाकर, मात-पिता को सौंपा आकर ।।
साठ लाख वर्षायु प्रभु की, अवगाहना थी साठ धनुष की ।।
कंचन जैसी छवि प्रभु- तन की, महिमा कैसे गाऊँ मैं उनकी ।।
बचपन बीता, यौवन आया, पिता ने राजतिलक करवाया ।।
चयन किया सुन्दर वधुओं का, आयोजन किया शुभ विवाह का ।।
एक दिन देखी ओस घास पर, हिमकण देखें नयन प्रीतिभर ।।
हुआ संसर्ग सूर्य रश्मि से, लुप्त हुए सब मोती जैसे ।।
हो विश्वास प्रभु को कैसे, खड़े रहे वे चित्रलिखित से ।।
“क्षणभंगुर है ये संसार, एक धर्म ही है बस सार ।।
वैराग्य हृदय में समाया, छोडे क्रोध -मान और माया ।।
घर पहुँचे अनमने से होकर, राजपाट निज सुत को देकर ।।
देवीमई शिविका पर चढ़कर, गए सहेतुक वन में जिनवर ।।
माघ मास-चतुर्थी कारी, “नम: सिद्ध” कह दीक्षाधारी ।।
रचना समोशरण हितकार, दिव्य देशना हुई सुरवकार ।।
उपशम करके मिथ्यात्व का, अनुभव करलो निज आत्म का ।।
मिथ्यात्व का होय निवारण, मिटे संसार भ्रमण का कारणा ।।
बिन सम्यक्तव के जप-तप-पूजन, विष्फल हैँ सारे व्रत- अर्चन ।।
विषफल हैं ये विषयभोग सब, इनको त्यागो हेय जान अब ।।
द्रव्य- भाव्-नो कमोदि से, भिन्न हैं आत्म देव सभी से ।।
निश्चय करके हे निज आतम का, ध्यान करो तुम परमात्म का ।।
ऐसी प्यारी हित की वाणी, सुनकर सुखी हुए सब प्राणी ।।
दूर-दूर तक हुआ विहार, किया सभी ने आत्मोद्धारा ।।
‘मन्दर’ आदि पचपन गणधर, अड़सठ सहस दिगम्बर मुनिवर ।।
उम्र रही जब तीस दिनों क, जा पहुँचे सम्मेद शिखर जी ।।
हुआ बाह्य वैभव परिहार, शेष कर्म बन्धन निरवार ।।
आवागमन का कर संहार, प्रभु ने पाया मोक्षागारा ।।
षष्ठी कृष्णा मास आसाढ़, देव करें जिनभवित प्रगाढ़ ।।
सुबीर कूट पूजें मन लाय, निर्वाणोत्सव को’ हर्षाय ।।
जो भवि विमलप्रभु को ध्यावें। वे सब मन वांछित फल पावें ।।
‘अरुणा’ करती विमल-स्तवन, ढीले हो जावें भव-बन्धन ।।
जाप: – ॐ ह्रीं अर्हं श्री विमलप्रभु नमः

श्री शीतलनाथ चालीसा

शीतल हैं शीतल वचन, चन्दन से अघिकाय ।
कल्पवृक्ष सम प्रभु चरण, है सबको सुखदाय ।
जय श्री शीतलनाथ गुणाकर, महिमा मण्डित.करुणासागर ।
भद्धिलपुर के दृढ़रथ राय, भूप प्रजावत्सल कहलाए ।
रमणी रत्न सुनन्दा रानी, गर्भ में आए जिनवर ज्ञानी ।
द्वादशी माघ बदी को जन्मे, हर्ष लहर उमडी त्रिभुवन में ।
उत्सव करते देव अनेक, मेरु पर करते अभिषेक ।
नाम दिया शिशु जिन को शीतल, भीष्म ज्वाल अध होती शीतल ।
एक लक्ष पूर्वायु प्रभु की, नब्बे धनुष अवगाहना वपु की ।
वर्ण स्वर्ण सम उज्जवलपीत, दया धर्म था उनका मीत ।
निरासक्त थे विषय भोग में, रत रहते थे आत्मयोग मेँ ।
एक दिन गए भ्रमण को वन में, करे प्रकृति दर्शन उपवन भे ।
लगे ओसकण मोती जैसे, लुप्त हुए सब सूर्योदय से ।
देख ह्रदय में हुआ वैराग्य, आतम हित में छोड़ा राग ।
तप करने का निश्चय करते, ब्रह्मार्षि अनुमोदन करते ।
विराजे शुक्रप्रभा शिविका पर, गए सहेतुक वन में जिनवर ।
संध्या समय ली दीक्षा अक्षुष्ण, चार ज्ञान धारी हुए तत्क्षण ।
दो दिन का व्रत करके इष्ट, प्रथमाहार हुआ नगर अरिष्ट ।
दिया आहार पुनर्वसु नृप ने, पंचाश्चर्य किए देवों ने ।
किया तीन वर्ष तप घोर, शीतलता फैली चहुँ ओर ।
कृष्ण चतुर्दशी पौषविरव्याता, कैवलज्ञानी हुए जगत्राता ।
रचना हुई तब समोशरण की, दिव्य देशना खिरी प्रभु की ।
“आतम हित का मार्ग बताया, शंकित चित समाधान कराया ।
तीन प्रकार आत्मा जानो, बहिरातन-अन्तरातम मानो ।
निश्चय करके निज आतम का, चिन्तन कर लो परमातम का ।
मोह महामद से मोहित जो, परमातम को नहीं मानें वो ।
वे ही भव… भव में भटकाते, वे ही बहिरातम कहलाते ।
पर पदार्थ से ममता तज के, परमात्म में श्रद्धा करके ।
जो नित आतम ध्यान लगाते, वे अन्तर- आतम कहलाते ।
गुण अनन्त के धारी है जो, कर्मों के परिहारी है जो ।
लोक शिखर के वासी है वे, परमात्म अविनाशी हैं वे ।
जिनवाणी पर श्रद्धा धरके, पार उतरते भविजन भव से ।
श्री जिनके इक्यासी गणधर, एक लक्ष थे पूज्य मुनिवर ।
अन्त समय गए सम्मेदाचंल, योग धार कर हो गए निश्चल ।
अश्विन शुक्ल अष्टमी आई, मुक्ति महल पहुंचे जिनराई ।
लक्षण प्रभु का ‘कल्पवृक्ष’ था, त्याग सकल सुख वरा मोक्ष था ।
शीतल चरण-शरण में आओ, कूट विद्युतवर शीश झुकाओ ।
शीतल जिन शीतल करें, सबके भव-आताप ।
हम सब के मन में बसे, हरे’ सकलं सन्ताप ।

श्री धर्मनाथ चालीसा

उत्तम क्षमा अदि दस धर्म,प्रगटे मूर्तिमान श्रीधर्म ।
जग से हरण करे सन अधर्म, शाश्वत सुख दे प्रभु धर्म ।।

नगर रतनपुर के शासक थे, भूपति भानु प्रजा पालक थे।
महादेवी सुव्रता अभिन्न, पुत्रा आभाव से रहती खिन्न ।।

प्राचेतस मुनि अवधिलीन, मत पिता को धीरज दीन ।
पुत्र तुम्हारे हो क्षेमंकर, जग में कहलाये तीर्थंकर ।।

धीरज हुआ दम्पति मन में, साधू वचन हो सत्य जगत में ।
मोह सुरम्य विमान को तजकर, जननी उदर बसे प्रभु आकर ।।

तत्क्षण सब देवों के परिकर, गर्भाकल्याणक करें खुश होकर ।
तेरस माघ मास उजियारी, जन्मे तीन ज्ञान के धारी ।।

तीन भुवन द्युति छाई न्यारी, सब ही जीवों को सुखकारी ।
माता को निंद्रा में सुलाकर, लिया शची ने गोद में आकर ।।

मेरु पर अभिषेक कराया, धर्मनाथ शुभ नाम धराया ।
देख शिशु सौंदर्य अपार, किये इन्द्र ने नयन हजार ।।

बीता बचपन यौवन आया, अदभुत आकर्षक तन पाया ।
पिता ने तब युवराज बनाया, राज काज उनको समझाया ।।

चित्र श्रृंगारवती का लेकर, दूत सभा में बैठा आकर ।
स्वयंवर हेतु निमंत्रण देकर, गया नाथ की स्वीकृति लेकर ।।

मित्र प्रभाकर को संग लेकर, कुण्डिनपुर को गए धर्मं वर ।
श्रृंगार वती ने वरा प्रभु को, पुष्पक यान पे आये घर को ।।

मात पिता करें हार्दिक प्यार, प्रजाजनों ने किया सत्कार ।
सर्वप्रिय था उनका शासन, निति सहित करते प्रजापालन ।।

उल्कापात देखकर एकदिन, भोग विमुख हो गए श्री जिन ।
सूत सुधर्म को सौप राज, शिविका में प्रभु गए विराज ।।

चलते संग सहस नृपराज, गए शालवन में जिनराज ।
शुक्ल त्रयोदशी माघ महीना, संध्या समय मुनि पदवी गहिना ।।

दो दिन रहे ध्यान में लीना, दिव्या दीप्ती धरे वस्त्र विहिना ।
तीसरे दिन हेतु आहार, पाटलीपुत्र का हुआ विहार ।।

अन्तराय बत्तीस निखार, धन्यसेन नृप दे आहार ।
मौन अवस्था रहती प्रभु की, कठिन तपस्या एक वर्ष की ।।

पूर्णमासी पौष मास की, अनुभूति हुई दिव्यभास की ।
चतुर्निकाय के सुरगण आये, उत्सव ज्ञान कल्याण मनाये ।।

समोशरण निर्माण कराये, अंतरिक्ष में प्रभु पधराये ।
निराक्षरी कल्याणी वाणी, कर्णपुटो से पीते प्राणी ।।

जीव जगत में जानो अनन्त, पुद्गल तो हैं अनन्तानन्त ।
धर्म अधर्म और नभ एक, काल समेत द्रव्य षट देख ।।

रागमुक्त हो जाने रूप, शिवसुख उसको मिले अनूप ।
सुन कर बहुत हुए व्रतधारी, बहुतों ने जिन दीक्षा धारी ।।

आर्यखंड से हुआ विहार, भूमंडल में धर्मं प्रचार ।
गढ़ सम्मेद गए आखिर में, लीन हुए निज अन्तरंग में ।।

शुक्ल ध्यान का हुआ प्रताप, हुए अघाती धात निष्पाप ।
नष्ट किये जग के संताप, मुक्ति महल पहुचे आप ।।

सौरठा
ज्येष्ठ चतुर्थी शुक्ल पक्षवर, पूजा करे सुर, कूट सुदत्तवर ।
लक्षण वज्रदंड शुभ जान, हुआ धर्म से धर्म का मान ।।

जो प्रतिदिन प्रभु के गुण गाते, अरुणा वे भी शिवपद पाते ।।

श्री कुन्थनाथ चालीसा

दयासिन्धु कुन्थु जिनराज, भवसिन्धु तिरने को जहाज ।
कामदेव… चक्री महाराज, दया करो हम पर भी आज ।
जय श्री कुन्युनाथ गुणखान, परम यशस्वी महिमावान ।
हस्तिनापुर नगरी के भूपति, शूरसेन कुरुवंशी अधिपति ।
महारानी थी श्रीमति उनकी, वर्षा होती थी रतनन की ।
प्रतिपदा बैसाख उजियारी, जन्मे तीर्थकर बलधारी ।
गहन भक्ति अपने उर धारे, हस्तिनापुर आए सुर सारे ।
इन्द्र प्रभु को गोद में लेकर, गए सुमेरु हर्षित होकर ।
न्हवन करें निर्मल जल लेकर, ताण्डव नृत्य करे भक्वि- भर 1
कुन्थुनाथ नाम शुभ देकर, इन्द्र करें स्तवन मनोहर ।
दिव्य-वस्त्र- भूषण पहनाए, वापिस हस्तिनापुर को आए ।
कम-क्रम से बढे बालेन्दु सम, यौवन शोभा धारे हितकार ।
धनु पैंतालीस उन्नत प्रभु- तन, उत्तम शोभा धारें अनुपम ।
आयु पिंचानवे वर्ष हजार, लक्षण ‘अज’ धारे हितकार ।
राज्याभिषेक हुआ विधिपूर्वक, शासन करें सुनीति पूर्वक ।
चक्ररत्तन शुभ प्राप्त हुआ जब, चक्रवर्ती कहलाए प्रभु तब ।
एक दिन गए प्रभु उपवन मेँ, शान्त मुनि इक देखे मग में ।
इंगिन किया तभी अंगुलिसे, “देखो मुनिको’ -कहा मंत्री से ।
मंत्री ने पूछा जब कारण, “किया मोक्षहित मुनिपद धारण’ ।
कारण करें और स्पष्ट, “मुनिपद से ही कर्म हों नष्ट’ ।
मंत्रो का तो हुआ बहाना, किया वस्तुतः निज कल्याणा ।
चिन विरक्त हुआ विषयों से, तत्व चिन्तन करते भावों से ।
निज सुत को सौंपा सब राज, गए सहेतुक वन जिनराज ।
पंचमुष्टि से कैशलौंचकर, धार लिया पद नगन दिगम्बर ।
तीन दिन बाद गए गजपुर को, धर्ममित्र पड़गाहें प्रभु को ।
मौन रहे सोलह वर्षों तक, सहे शीत-वर्षा और आतप ।
स्थिर हुए तिलक तरु- जल में, मगन हुए निज ध्यान अटल में ।
आतम ने बढ़ गई विशुद्धि, कैवलज्ञान की हो गई सिद्धि ।
सूर्यप्रभा सम सोहें आप्त, दिग्मण्डल शोभा हुई व्याप्त ।
समोशरण रचना सुखकार, ज्ञाननृपित बैठे नर- नार ।
विषय-भोग महा विषमय है, मन को कर देते तन्मय हैं ।
विष से मरते एक जनम में, भोग विषाक्त मरें भव- भव में ।
क्षण भंगुर मानब का जीवन, विद्युतवन विनसे अगले क्षण ।
सान्ध्य ललिमा के सदृश्य ही, यौवन हो जाता अदृश्य ही ।
जब तक आतम बुद्धि नही हो, तब तक दरश विशुद्धि नहीं हौं ।
पहले विजित करो पंचेन्द्रिय, आत्तमबल से बनो जितेन्द्रिय ।
भव्य भारती प्रभु की सुनकर, श्रावकजन आनन्दित को कर ।
श्रद्धा से व्रत धारण करते, शुभ भावों का अर्जन करते ।
शुभायु एक मास रही जब, शैल सम्मेद पे वास किया तब ।
धारा प्रतिमा रोग वहॉ पर, काटा क्रर्मबन्ध्र सब प्रभुवर ।
मोक्षकल्याणक करते सुरगण, कूट ज्ञानधर करते पूजन ।
चक्री… कामदेव… तीर्थंकर, कुंन्धुनाथ थे परम हितंकर ।
चालीसा जो पढे भाव से, स्वयंसिद्ध हों निज स्वभाव से ।
धर्म चक्र के लिए प्रभु ने, चक्र सुदर्शन तज डाला ।
इसी भावना ने अरुणा को, किया ज्ञान में मतवाला ।
जाप: – ॐ ह्रीं अर्हं श्री कुन्थनाथाय नमः

 

श्री महावीर चालीसा

 शीश नवा अरिहन्त को, सिद्धन करूँ प्रणाम।

उपाध्याय आचार्य का, ले सुखकारी नाम।

सर्व साधु और सरस्वती, जिन मन्दिर सुखकार।

महावीर भगवान को, मन-मन्दिर में धार।

 

जय महावीर दयालु स्वामी, वीर प्रभु तुम जग में नामी।

वर्धमान है नाम तुम्हारा, लगे हृदय को प्यारा प्यारा।

शांति छवि और मोहनी मूरत, शान हँसीली सोहनी सूरत।

तुमने वेश दिगम्बर धारा, कर्म-शत्रु भी तुम से हारा।

क्रोध मान अरु लोभ भगाया, महा-मोह तुमसे डर खाया।

तू सर्वज्ञ सर्व का ज्ञाता, तुझको दुनिया से क्या नाता।

तुझमें नहीं राग और द्वेष, वीर रण राग तू हितोपदेश।

तेरा नाम जगत में सच्चा, जिसको जाने बच्चा बच्चा।

भूत प्रेत तुम से भय खावें, व्यन्तर राक्षस सब भग जावें।

महा व्याध मारी न सतावे, महा विकराल काल डर खावे।

काला नाग होय फन धारी, या हो शेर भयंकर भारी।

ना हो कोई बचाने वाला, स्वामी तुम्हीं करो प्रतिपाला।

अग्नि दावानल सुलग रही हो, तेज हवा से भड़क रही हो।

नाम तुम्हारा सब दुख खोवे, आग एकदम ठण्डी होवे।

हिंसामय था भारत सारा, तब तुमने कीना निस्तारा।

जनम लिया कुण्डलपुर नगरी, हुई सुखी तब प्रजा सगरी।

सिद्धारथ जी पिता तुम्हारे, त्रिशला के आँखों के तारे।

छोड़ सभी झंझट संसारी, स्वामी हुए बाल-ब्रह्मचारी।

पंचम काल महा-दुखदाई, चाँदनपुर महिमा दिखलाई।

टीले में अतिशय दिखलाया, एक गाय का दूध गिराया।

सोच हुआ मन में ग्वाले के, पहुँचा एक फावड़ा लेके।

सारा टीला खोद बगाया, तब तुमने दर्शन दिखलाया।

जोधराज को दुख ने घेरा, उसने नाम जपा जब तेरा।

ठंडा हुआ तोप का गोला, तब सब ने जयकारा बोला।

मंत्री ने मन्दिर बनवाया, राजा ने भी द्रव्य लगाया।

बड़ी धर्मशाला बनवाई, तुमको लाने को ठहराई।

तुमने तोड़ी बीसों गाड़ी, पहिया खसका नहीं अगाड़ी।

ग्वाले ने जो हाथ लगाया, फिर तो रथ चलता ही पाया।

पहिले दिन बैशाख बदी के, रथ जाता है तीर नदी के।

मीना गूजर सब ही आते, नाच-कूद सब चित उमगाते।

स्वामी तुमने प्रेम निभाया, ग्वाले का बहु मान बढ़ाया।

हाथ लगे ग्वाले का जब ही, स्वामी रथ चलता है तब ही।

मेरी है टूटी सी नैया, तुम बिन कोई नहीं खिवैया।

मुझ पर स्वामी जरा कृपा कर, मैं हूँ प्रभु तुम्हारा चाकर।

तुम से मैं अरु कछु नहीं चाहूँ, जन्म-जन्म तेरे दर्शन पाऊँ।

चालीसे को चन्द्र बनावे, बीर प्रभु को शीश नवावे।

सोरठा :

नित चालीसहि बार, बाठ करे चालीस दिन।

खेय सुगन्ध अपार, वर्धमान के सामने।।

होय कुबेर समान, जन्म दरिद्री होय जो।

जिसके नहिं संतान, नाम वंश जग में चले।।

 

क्षमावाणी पर्व (kshamavani parv)

प्रिय दोस्तों
आज हम आपके समक्ष क्षमावाणी पर्व के उपलक्ष में चर्चा करेंगे की क्षमावाणी पर्व क्या है और यह कब और क्यों मनाया जाता है /अगर आप इस पर्व के बारे में पढ़ेंगे और जानेगे तो मेरा वादा है की आप को भी इस पर्व को मानाने की उत्सुकता होगी /
क्षमावाणी -”उद्पद्यते  शांत ”

हम मानते है की गलतिया मनुष्य से होती है गलतियों के लिए क्षमा मांग लेने और दुसरो को क्षमा देने से ही सुख शांति के द्वार खुलते है किसी की गलती के लिए मन में क्रोध करने ,उद्देग पैदा करने से हमारा ही नुकसान होता है ,हमारी शांति भंग होती है यदि आप लोग जीवन में सुख शांति चाहते है तो क्षमाशील बनिए /
गलती के लिए क्षमा मांग लीजिये और दुसरो को भी क्षमा करते जाइये/ यह पर्व दसलक्षण पर्व के आखिरी दिन मनाया जाता है अर्थात क्षमावाणी पर्व ”असौज कृष्णा एकम ” के दिन मनाया जाता है /
”क्षमा गहो उर जीवड़ा , जिनवर वचन गहाय,
नीर सुगंध सुहावनो , पदम  देह को लाय,
जन्म रोग निर्वारिये , सम्यक रत्न लहाय,
क्षमा गहो उर जीवड़ा , जिनवर वचन गाहय /
इस पर्व को हम ”मिक्षामि दुक्कडम ” के नाम से भी जानते है दिगम्बरो में यह ११ दिन शेताम्बरो में यह ८ दिन मनाया जाता है क्योकि शेताम्बरो में पर्युषण पर्व ८ दिन के होते है / मिक्षामि का भाव क्षमा और दुक्कडम का अर्थ गलतियों से है अर्थात मिक्षामि दुक्कडम कह कर हम अपनी गलतियों की क्षमा मांगते है जीवन के बैर भाव को मिटाता है /

जीवन में यदि कुछ भी अवयवस्थित हुआ हो तो पारम्परिक वयवस्था के अनुसार इसे दूर करने को क्षमायाचना कहते है /कहते है – यह अवयवस्था परिवार , रिश्तेदार ,समाज ,देश और राष्ट्र के अंतर्गत भी हो सकती है इस अवयवस्था को सद्भावपूर्वक सुधारने का जो महत्व है क्षमायाचना पर्व का है/ यह सब अवयवस्थाए इसलिए पैदा होती है की जीवन में तो गलतियां होती है किन्तु हम यह नहीं समझ पाते है कि यह गलतियां हमारे से हुई है कि अगले से /जब हम अपने दोषो ,गलतियों को मानना शुरू कर देते है तो हमारे अंदर क्षमाशील भाव आ जाता है तो कोई कुछ भी कहे मन में क्रोध नहीं आता जिनके मन में क्षमाशील भाव आता है वे  ख़ुशी , प्रसन्ता के प्रतिक बन जाते है उनके जीवन में सद्गुण खिलते है वे फूलो  कि तरह महकते है उनका जीवन क्षमा भाव से भर जाता है आप भी अपनी सोच ,चेतना,चिन्तन को अपनी आत्मा से जोड़ने का प्रयत्न करे अपने को जानने का प्रयास करे जब आप ऐसा करोगे तो आप भी दुसरो को क्षमा दे सकोगे यदि आप को कोई गाली भी देता है तो आप क्रोधित या उत्तेजित नहीं होंगे यदि आप क्रोधित होंगे तो आपकी पूरी चेतना उधर मुड़ जाएगी उसे ही देखने सोचने में लग जाएगी इससे हमारे अंदर कि ऊर्जा का बहिर्गमन होता रहेगा /क्रोध बढ़ता है उद्देग पैदा होता है इससे जो क्रिया होती है वह दोनों के लिए शुभ नहीं होती इसलिए कोई गाली देता है तो उसके विषय में सोचने कि बजाय ,स्यम के विषय में सोचे , चिंतन करे / सोचे आखिर हमारी क्या गलती है हमारे अंदर क्या कमी है जब हम अपने को समझ लेंगे तो हमारा क्रोध शांत हो जायेगा/ उत्तेजना , वैमनस्य , वैर विरोध , कमजोर हो जायेगे जीवन कि बुराई कमजोर हो कर दूर होती जायेगे संयम बरतने ,क्षमाशील होने से ही हमारे जीवन में परिवर्तन आता है /
सुख शांति व समृद्धि के लिए भगवन महावीर स्वामी द्वारा बताये अनुसार ‘क्षमा ‘ घर से शुरू करने का सुझाव दिया गया है थोड़ी देर सहनशीलता रखने ,संयम बरतने ,किसी कि गलती पर उसे क्षमा कर देने से परिवार ,समाज ,राष्ट्र व विश्व का भला ही होता है परिवार में यदि गलती होती है तो माफ़ी देने से प्रेम ,मोहब्बत बढ़ती है रिश्ते और अधिक प्रगाण होते है बहार भी अच्छा माहोल बनता है थोड़ी देर सहनशीलता रखने क्षमा करने में हमारा कुछ नुकसान नहीं होता बल्कि फायदा ही होता है क्षमा करके हम किसी का जीवन सुधार सकते है क्रूर से क्रूर व्यक्ति कि आत्मा को महान बना सकते है इसलिए तो अध्यात्म में क्षमा को ही सबसे बड़ा हथियार कहा गया है क्षमा को वीरो का गहना माना गया है आप भी अपने जीवन को इस गहने से सजाइये जीवन में हमेशा सुख शांति रहेगी /
*क्षमावाणी पर्व देता है मधुरता व मित्रता का सन्देश /
*क्षमावाणी पर्व माफ़ी देने व लेने का पर्व है /
*क्षमावाणी पर्व जीवन के बैर भाव दूर करने का पर्व है /
इस पर्व में हम चाहे छोटे हो या बड़े माफ़ी मांग कर अपनी गलतियों कि निर्जरा करते है इसलिए हम कह सकते है कि क्षमावाणी पर्व महान पर्व है अगर आप को इस पर्व के बारे में जान कर अच्छा लगा तो आप भी इस पर्व कि अच्छाइयों को अपने जीवन में उतारे और सब को क्षमा भाव करते जाये और ऐसे ही बहुत से पर्वो कि जानकारी हम देते रहेंगे आप पड़ना न बुले और हमारी साइट पर बार बार आते रहिये मेरा वादा है कि हम आप को जैन धर्म से जुडी और भी अच्छी अच्छी जानकारी देते रहेंगे /
”  धन्यवाद ”
”सादर जय जिनेद्र ”

श्री मल्लिनाथ चालीसा

मोहमल्ल मद-मर्दन करते, मन्मथ दुर्द्धर का मद हरते ।।

धैर्य खड्ग से कर्म निवारे, बालयति को नमन हमारे ।।
बिहार प्रान्त ने मिथिला नगरी, राज्य करें कुम्भ काश्यप गोत्री ।।
प्रभावती महारानी उनकी, वर्षा होती थी रत्नों की ।।
अपराजित विमान को तजकर, जननी उदर वसे प्रभु आकर ।।
मंगसिर शुक्ल एकादशी शुभ दिन, जन्मे तीन ज्ञान युन श्री जिन ।।
पूनम चन्द्र समान हों शोभित, इन्द्र न्हवन करते हो मोहित ।।
ताण्डव नृत्य करें खुश होकर, निररवें प्रभुकौ विस्मित होकर ।।
बढे प्यार से मल्लि कुमार, तन की शोभा हुई अपार ।।
पचपन सहस आयु प्रभुवर की, पच्चीस धनु अवगाहन वपु की ।।
देख पुत्र की योग्य अवस्था, पिता व्याह को को व्यवस्था ।।
मिथिलापुरी को खूब सजाया, कन्या पक्ष सुन कर हर्षाया ।।
निज मन मेँ करते प्रभु मन्थन, है विवाह एक मीठा बन्धन ।।
विषय भोग रुपी ये कर्दम, आत्मज्ञान को करदे दुर्गम ।।
नही आसक्त हुए विषयन में, हुए विरक्त गए प्रभु वन मेँ ।।
मंगसिर शुक्ल एकादशी पावन, स्वामी दीक्षा करते धारण ।।
दो दिन का धरा उपवास, वन में ही फिर किया निवास ।।
तीसरे दिन प्रभु करे विहार, नन्दिषेण नृप वे आहार ।।
पात्रदान से हर्षित होकर, अचरज पाँच करें सुर आकर ।।
मल्लिनाथ जी लौटे वन ने, लीन हुए आतम चिन्तन में ।।
आत्मशुद्धि का प्रबल प्रमाण, अल्प समय में उपजा ज्ञान ।।
केवलज्ञानी हुए छः दिन में, घण्टे बजने लगे स्वर्ग में ।।
समोशरण की रचना साजे, अन्तरिक्ष में प्रभु बिराजे ।।
विशाक्ष आदि अट्ठाइस गणधर, चालीस सहस थे ज्ञानी मुनिवर ।।
पथिकों को सत्पथ दिखलाया, शिवपुर का सन्मार्ग बताया ।।
औषधि-शास्त्र- अभय- आहार, दान बताए चार प्रकार ।।
पंच समिति और लब्धि पाँच, पाँचों पैताले हैं साँच ।।
षट् लेश्या जीव षट्काय, षट् द्रव्य कहते समझाय ।।
सात त्त्व का वर्णन करते, सात नरक सुन भविमन डरते ।।
सातों नय को मन में धारें, उत्तम जन सन्देह निवारें ।।
दीर्घ काल तक दिए उपदेश, वाणी में कटुता नहीं लेश ।।
आयु रहने पर एक मान, शिखर सम्मेद पे करते वास ।।
योग निरोध का करते पालन, प्रतिमा योग करें प्रभु धारण ।।
कर्म नष्ट कीने जिनराई, तनंक्षण मुक्ति- रमा परणाई ।।
फाल्गुन शुक्ल पंचमी न्यारी, सिद्ध हुए जिनवर अविकारी ।।
मोक्ष कल्याणक सुर- नर करते, संवल कूट की पूजा करते ।।
चिन्ह ‘कलश’ था मल्लिनाथ का, जीन महापावन था उनका ।।
नरपुंगव थे वे जिनश्रेष्ठ, स्त्री कहे जो सत्य न लेश ।।
कोटि उपाय करो तुम सोच, स्वीभव से हो नहीं मोक्ष ।।
महाबली थे वे शुरवीर, आत्म शत्रु जीते धर- धीर ।।
अनुकम्पा से प्रभु मल्लि हैं, अल्पायु हो भव… वल्लि की ।।
अरज यही है बस हम सब की, दृष्टि रहे सब पर करूणा की ।।

श्री मुनिसुव्रतनाथ चालीसा

अरिहंत सिद्ध आचार्य को करुं प्रणाम |
उपाध्याय सर्वसाधू करते स्वपर कल्याण ||
जिनधर्म, जिनागम, जिनमंदिर पवित्र धाम |
वीतराग की प्रतिमा को कोटि-कोटि प्रणाम ||
जय मुनिसुव्रत दया के सागर | नाम प्रभु का लोक उजागर ||
सुमित्रा राजा के तुम नन्दा | मां शामा की आंखो के चन्दा ||
श्यामवर्ण मूरत प्रभू की प्यारी | गुणगान करें निशदिन नर नारी ||
मुनिसुव्रत जिन हो अन्तरयामी | श्रद्धा भाव सहित तुम्हें प्रणामी ||
भक्ति आपकी जो निशदिन करता | पाप ताप भय संकट-हरता ||
प्रभू ; संकटमोचन नाम तुम्हारा | दीन दुखी जीवों का सहारा ||
कोई दरिद्री या तन का रोगी | प्रभू दर्शन से होते हैं निरोगी ||
मिथ्या तिमिर भयो अति भारी | भव भव की बाधा हरो हमारी ||
यह संसार महा दुख दाई | सुख नहीं यहां दुख की खाई ||
मोह जाल में फंसा है बंदा | काटो प्रभु भव भव का फंदा ||
रोग शोक भय व्याधि मिटावो | भव सागर से पार लगावो ||
घिरा कर्म से चौरासी भटका | मोह माया बन्धन में अटका ||
संयोग-वियोग भव भव का नाता | राग द्वेष जग में भटकाता ||
हित मित प्रित प्रभू की वाणी | स्वपर कल्याण करें मुनि ध्यानी ||
भव सागर बीच नाव हमारी | प्रभु पार करो यह विरद तिहारी ||
मन विवेक मेरा अब जागा | प्रभु दर्शन से कर्ममल भागा ||
नाम आपका जपे जो भाई | लोका लोक सुख सम्पदा पाई ||
कृपा दृष्टी जब आपकी होवे | धन आरोग्य सुख समृधि पावे ||
प्रभु चरणन में जो जो आवे | श्रद्धा भक्ति फल वांच्छित पावे ||
प्रभु आपका चमत्कार है न्यारा | संकट मोचन प्रभु नाम तुम्हारा ||
सर्वज्ञ अनंत चतुष्टय के धारी | मन वच तन वंदना हमारी ||
सम्मेद शिखर से मोक्ष सिधारे | उद्धार करो मैं शरण तिहांरे ||
महाराष्ट्र का पैठण तीर्थ | सुप्रसिद्ध यह अतिशय क्षेत्र ||
मनोज्ञ मन्दिर बना है भारी | वीतराग की प्रतिमा सुखकारी ||
चतुर्थ कालीन मूर्ति है निराली | मुनिसुव्रत प्रभू की छवि है प्यारी ||
मानस्तंभ उत्तग की शोभा न्यारी | देखत गलत मान कषाय भारी ||
मुनिसुव्रत शनिग्रह अधिष्ठाता | दुख संकट हरे देवे सुख साता ||
शनि अमावस की महिमा भारी | दूर-दूर से आते नर नारी ||
मुनिसुव्रत दर्शन महा हितकारी | मन वच तन वंदना हमारी ||

सोरठाः-

सम्यक् श्रद्धा से चालीसा, चालीस दिन पढिये नर-नार |
मुक्ति पथ के राही बन, भक्ति से होवे भव पार ||

श्री शान्तिनाथ चालीसा

शान्तिनाथ भगवान का, चालीसा सुखकार ।।
मोक्ष प्राप्ति के लिय, कहूँ सुनो चितधार ।।
चालीसा चालीस दिन तक, कह चालीस बार ।।
बढ़े जगत सम्पन, सुमत अनुपम शुद्ध विचार ।।

शान्तिनाथ तुम शान्तिनायक, पण्चम चक्री जग सुखदायक ।।
तुम ही सोलहवे हो तीर्थंकर, पूजें देव भूप सुर गणधर ।।
पत्र्चाचार गुणोके धारी, कर्म रहित आठों गुणकारी ।।
तुमने मोक्ष मार्ग दर्शाया, निज गुण ज्ञान भानु प्रकटाया ।।

स्याद्वाद विज्ञान उचारा, आप तिरे औरन को तारा ।।
ऎसे जिन को नमस्कार कर, चढूँ सुमत शान्ति नौका पर ।।
सूक्ष्म सी कुछ गाथा गाता, हस्तिनापुर जग विख्याता ।।
विश्व सेन पितु, ऐरा माता, सुर तिहुं काल रत्न वर्षाता ।।

साढे दस करोड़ नित गिरते, ऐरा माँ के आंगन भरते ।।
पन्द्रह माह तक हुई लुटाई, ले जा भर भर लोग लुगाई ।।
भादों बदी सप्तमी गर्भाते, उतम सोलह स्वप्न आते ।।
सुर चारों कायों के आये, नाटक गायन नृत्य दिखाये ।।

सेवा में जो रही देवियाँ, रखती खुश माँ को दिन रतियां ।।
जन्म सेठ बदी चौदश के दिन, घन्टे अनहद बजे गगन घन ।।
तीनों ज्ञान लोक सुखदाता, मंगल सकल हर्ष गुण लाता ।।
इन्द्र देव सुर सेवा करते, विद्या कला ज्ञान गुण बढ़ते ।।

अंग-अंग सुन्दर मनमोहन, रत्न जड़ित तन वस्त्राभूषण ।।
बल विक्रम यश वैभव काजा, जीते छहों खण्ड के राजा ।।
न्यायवान दानी उपचारी, प्रजा हर्षित निर्भय सारी ।।
दीन अनाथ दुखी नही कोई, होती उत्तम वस्तु वोई ।।

ऊँचे आप आठ सौ गज थे, वदन स्वर्ण अरू चिन्ह हिरण थे ।।
शक्ति ऐसी थी जिस्मानी, वरी हजार छानवें रानी ।।
लख चौरासी हाथी रथ थे, घोड़े करोङ अठारह शुभ थे ।।
सहस पचास भूप के राजन, अरबो सेवा में सेवक जन ।।

तीन करोड़ थी सुंदर गईयां, इच्छा पूर्ण करें नौ निधियां ।।
चौदह रतन व चक्र सुदर्शन, उतम भोग वस्तुएं अनगिन ।।
थी अड़तालीस कोङ ध्वजायें, कुंडल चंद्र सूर्य सम छाये ।।
अमृत गर्भ नाम का भोजन, लाजवाब ऊंचा सिंहासन ।।

लाखो मंदिर भवन सुसज्जित, नार सहित तुम जिसमें शोभित ।।
जितना सुख था शांतिनाथ को, अनुभव होता ज्ञानवान को ।।
चलें जिव जो त्याग धर्म पर, मिले ठाठ उनको ये सुखकर ।।
पचीस सहस्त्रवर्ष सुख पाकर, उमङा त्याग हितंकर तुमपर ।।

वैभव सब सपने सम माना, जग तुमने क्षणभंगुर जाना ।।
ज्ञानोदय जो हुआ तुम्हारा, पाये शिवपुर भी संसारा ।।
कामी मनुज काम को त्यागें, पापी पाप कर्म से भागे ।।
सुत नारायण तख्त बिठाया, तिलक चढ़ा अभिषेक कराया ।।

नाथ आपको बिठा पालकी, देव चले ले राह गगन की ।।
इत उत इन्दर चँवर ढुरवें, मंगल गाते वन पहुँचावें ।।
भेष दिगम्बर अपना कीना, केश लोच पन मुष्ठी कीना ।।
पूर्ण हुआ उपवास छटा जब, शुद्धाहार चले लेने तब ।।

कर तीनों वैराग चिन्तवन, चारों ज्ञान किये सम्पादन ।।
चार हाथ मग चलतें चलते, षट् कायिक की रक्षा करते ।।
मनहर मीठे वचन उचरते, प्राणिमात्र का दुखड़ा हरते ।।
नाशवान काया यह प्यारी, इससे ही यह रिश्तेदारी ।।

इससे मात पिता सुत नारी, इसके कारण फिरो दुखारी ।।
गर यह तन प्यारा सगता, तरह तरह का रहेगा मिलता ।।
तज नेहा काया माया का , हो भरतार मोक्ष दारा का ।।
विषय भोग सब दुख का कारण, त्याग धर्म ही शिव के साधन ।।

निधि लक्ष्मी जो कोई त्यागे, उसके पीछे पीछे भागे ।।
प्रेम रूप जो इसे बुलावे, उसके पास कभी नही आवे ।।
करने को जग का निस्तारा, छहों खण्ड का राज विसारा ।।
देवी देव सुरा सर आये, उत्तम तप कल्याण मनाये ।।

पूजन नृत्य करें नत मस्तक, गाई महिमा प्रेम पूर्वक ।।
करते तुम आहार जहाँ पर, देव रतन वर्षाते उस घर ।।
जिस घर दान पात्र को मिलता, घर वह नित्य फूलता-फलता ।।
आठों गुण सिद्धों के ध्याकर, दशों धर्म चित काय तपाकर ।।

केवल ज्ञान आपने पाया, लाखों प्राणी पार लगाया ।।
समवशरण में धंवनि खिराई, प्राणी मात्र समझ में आई ।।
समवशरण प्रभु का जहाँ जाता, कोस चार सौ तक सुख पाता ।।
फूल फलादिक मेवा आती, हरी भरी खेती लहराती ।।

सेवा में छत्तिस थे गणधार, महिमा मुझसे क्या हो वर्णन ।।
नकुल सर्प मृग हरी से प्राणी, प्रेम सहित मिल पीते पानी ।।।
आप चतुर्मुख विराजमान थे, मोक्ष मार्ग को दिव्यवान थे ।।
करते आप विहार गगन में अन्तरिक्ष थे समवशरण में ।।

तीनो जगत आनन्दित किने, हित उपदेश हजारो दीने ।।
पौने लाख वर्ष हित कीना, उम्र रही जब एक महीना ।।
श्री सम्मेद शिखर पर आये, अजर अमर पद तुमनेे पाये ।।
निष्पृह कर उद्धार जगत के, गये मोक्ष तुम लाख वर्ष के ।।

आंक सकें क्या छवी ज्ञान की, जोत सुर्य सम अटल आपकी ।।
बहे सिन्धु सम गुण की धारा, रहे सुमत चित नाम तुम्हारा ।।

नित चालीस ही बार पाठ करें चालीस दिन ।
खेये सुगन्ध अपार, शांतिनाथ के सामने ।।
होवे चित प्रसन्न, भय चिंता शंका मिटे ।
पाप होय सब हन्न, बल विद्या वैभव बढ़े ।।

श्री पुष्पदन्त चालीसा

दुख से तप्त मरूस्थल भव में, सघन वृक्ष सम छायाकार ।।

पुष्पदन्त पद – छत्र – छाँव में हम आश्रय पावे सुखकार ।।

जम्बूद्विप के भारत क्षेत्र में, काकन्दी नामक नगरी में ।।

राज्य करें सुग्रीव बलधारी, जयरामा रानी थी प्यारी ।।

नवमी फाल्गुन कृष्ण बल्वानी, षोडश स्वप्न देखती रानी ।।

सुत तीर्थंकर हर्भ में आएं, गर्भ कल्याणक देव मनायें ।।

प्रतिपदा मंगसिर उजयारी, जन्मे पुष्पदन्त हितकारी ।।

जन्मोत्सव की शोभा नंयारी, स्वर्गपूरी सम नगरी प्यारी ।।

आयु थी दो लक्ष पूर्व की, ऊँचाई शत एक धनुष की ।।

थामी जब राज्य बागडोर, क्षेत्र वृद्धि हुई चहुँ ओर ।।

इच्छाएँ उनकी सीमीत, मित्र पर्भु के हुए असीमित ।।

एक दिन उल्कापात देखकर, दृष्टिपाल किया जीवन पर ।।

स्िथर कोई पदार्थ न जग में, मिले न सुख किंचित्  भवमग में ।।

ब्रह्मलोक से सुरगन आए, जिनवर का वैराग्य बढ़ायें।।

सुमति पुत्र को देकर राज, शिविका में प्रभु गए विराज ।।

पुष्पक वन में गए हितकार, दीक्षा ली संगभूप हज़ार ।।

गए शैलपुर दो दिन बाद, हुआ आहार वहाँ निराबाद ।।

पात्रदान से हर्षित होमकर, पंचाश्चर्य करे सुर आकर ।।

प्रभुवर लोट गए उपवन को, तत्पर हुए कर्म- छेदन को ।।

लगी समाधि नाग वृक्ष तल, केवलज्ञान उपाया निर्मल ।।

इन्द्राज्ञा से समोश्रण की, धनपति ने आकर रचना की ।।

दिव्य देशना होती प्रभु की, ज्ञान पिपासा मिटी जगत की ।।

अनुप्रेक्षा द्वादश समझाई, धर्म स्वरूप विचारो भाई ।।

शुक्ल ध्यान की महिमा गाई, शुक्ल ध्यान से हों शिवराई ।।

चारो भेद सहित धारो मन, मोक्षमहल में पहुँचो तत्क्षण ।।

मोक्ष मार्ग दर्शाया प्रभु ने, हर्षित हुए सकल जन मन में ।।

इन्द्र करे प्रार्थना जोड़ कर, सुखद विहार हुआ श्री जिनवर ।।

गए अन्त में शिखर सम्मेद, ध्यान में लीन हुए निरखेद ।।

शुक्ल ध्यान से किया कर्मक्षय, सन्ध्या समय पाया पद आक्षय ।।

अश्विन अष्टमी शुकल महान, मोक्ष कल्याणक करें सुर आन ।।

सुप्रभ कूट की करते पूजा, सुविधि नाथ नाम है दूजा ।।

मगरमच्छ है लक्षण प्रभु का, मंगलमय जीवन था उनका ।।

शिखर सम्मेद में भारी अतिशय, प्रभु प्रतिमा है चमत्कारमय ।।

कलियुग में भी आते देव, प्रतिदिन नृत्य करें स्वयमेव ।।

घुंघरू की झंकार गूंजती, सब के मन को मोहित करती ।।

ध्वनि सुनी हमने कानो से, पूजा की बहु उपमानो से ।।

हमको है ये दृड श्रद्धान, भक्ति से पायें शिवथान ।।

भक्ति में शक्ति है न्यारी, राह दिखायें करूणाधारी ।।

पुष्पदन्त गुणगान से, निश्चित हो कल्याण ।।

हम सब अनुक्रम से मिले, अन्तिम पद निर्वाण ।।