समाधि भावना

समाधि भावना

दिन रात मेरे स्वामी, मैं भावना ये भाऊँ,
देहांत के समय में, तुमको न भूल जाऊँ । टेक।
शत्रु अगर कोई हो, संतुष्ट उनको कर दूँ,
समता का भाव धर कर, सबसे क्षमा कराऊँ ।१।

त्यागूँ आहार पानी, औषध विचार अवसर,
टूटे नियम न कोई, दृढ़ता हृदय में लाऊँ ।२।

जागें नहीं कषाएँ, नहीं वेदना सतावे,
तुमसे ही लौ लगी हो,दुर्ध्यान को भगाऊँ ।३।

आत्म स्वरूप अथवा, आराधना विचारूँ,
अरहंत सिद्ध साधूँ, रटना यही लगाऊँ ।४।

धरमात्मा निकट हों, चर्चा धरम सुनावें,
वे सावधान रक्खें, गाफिल न होने पाऊँ ।५।

जीने की हो न वाँछा, मरने की हो न ख्वाहिश,
परिवार मित्र जन से, मैं मोह को हटाऊँ ।६।

भोगे जो भोग पहिले, उनका न होवे सुमिरन,
मैं राज्य संपदा या, पद इंद्र का न चाहूँ ।७।

रत्नत्रय का पालन, हो अंत में समाधि,
‘शिवराम’ प्रार्थना यह, जीवन सफल बनाऊँ ।८।

निर्वाण कांड भाषा

निर्वाण कांड भाषा

॥दोहा॥

वीतराग वंदौं सदा, भावसहित सिरनाय।
कहुँ कांड निर्वाण की भाषा सुगम बनाय॥
अष्टापद आदीश्वर स्वामी, बासु पूज्य चंपापुरनामी।
नेमिनाथस्वामी गिरनार वंदो, भाव भगति उरधार ॥१॥

चरम तीर्थंकर चरम शरीर, पावापुरी स्वामी महावीर।
शिखर सम्मेद जिनेसुर बीस, भाव सहित वंदौं निशदीस ॥२॥

वरदतराय रूइंद मुनिंद, सायरदत्त आदिगुणवृंद।
नगरतारवर मुनि उठकोडि, वंदौ भाव सहित करजोड़ि ॥३॥

श्री गिरनार शिखर विख्यात, कोडि बहत्तर अरू सौ सात।
संबु प्रदुम्न कुमार द्वै भाय, अनिरुद्ध आदि नमूं तसु पाय ॥४॥

रामचंद्र के सुत द्वै वीर, लाडनरिंद आदि गुण धीर।
पाँचकोड़ि मुनि मुक्ति मंझार, पावागिरि बंदौ निरधार ॥५॥

पांडव तीन द्रविड़ राजान आठकोड़ि मुनि मुक्तिपयान।
श्री शत्रुंजय गिरि के सीस, भाव सहित वंदौ निशदीस ॥६॥

जे बलभद्र मुक्ति में गए, आठकोड़ि मुनि औरहु भये।
श्री गजपंथ शिखर सुविशाल, तिनके चरण नमूं तिहूँ काल ॥७॥

राम हणू सुग्रीव सुडील, गवगवाख्य नीलमहानील।
कोड़ि निण्यान्वे मुक्ति पयान, तुंगीगिरी वंदौ धरिध्यान ॥८॥

नंग अनंग कुमार सुजान, पाँच कोड़ि अरू अर्ध प्रमान।
मुक्ति गए सोनागिरि शीश, ते वंदौ त्रिभुवनपति इस ॥९॥

रावण के सुत आदिकुमार, मुक्ति गए रेवातट सार।
कोड़ि पंच अरू लाख पचास ते वंदौ धरि परम हुलास। ।१०॥

रेवा नदी सिद्धवरकूट, पश्चिम दिशा देह जहाँ छूट।
द्वै चक्री दश कामकुमार, उठकोड़ि वंदौं भवपार। ।११॥

बड़वानी बड़नयर सुचंग, दक्षिण दिशि गिरिचूल उतंग।
इंद्रजीत अरू कुंभ जु कर्ण, ते वंदौ भवसागर तर्ण। ।१२॥

सुवरण भद्र आदि मुनि चार, पावागिरिवर शिखर मंझार।
चेलना नदी तीर के पास, मुक्ति गयैं बंदौं नित तास। ॥१३॥

फलहोड़ी बड़ग्राम अनूप, पश्चिम दिशा द्रोणगिरि रूप।
गुरु दत्तादि मुनिसर जहाँ, मुक्ति गए बंदौं नित तहाँ। ।१४॥

बाली महाबाली मुनि दोय, नागकुमार मिले त्रय होय।

श्री अष्टापद मुक्ति मंझार, ते बंदौं नितसुरत संभार। ।१५॥

अचलापुर की दशा ईसान, जहाँ मेंढ़गिरि नाम प्रधान।
साड़े तीन कोड़ि मुनिराय, तिनके चरण नमूँ चितलाय। ।१६॥

वंशस्थल वन के ढिग होय, पश्चिम दिशा कुन्थुगिरि सोय।
कुलभूषण दिशिभूषण नाम, तिनके चरणनि करूँ प्रणाम। ।१७॥

जशरथराजा के सुत कहे, देश कलिंग पाँच सो लहे।
कोटिशिला मुनिकोटि प्रमान, वंदन करूँ जौर जुगपान। ।१८॥

समवसरण श्री पार्श्वजिनेंद्र, रेसिंदीगिरि नयनानंद।
वरदत्तादि पंच ऋषिराज, ते वंदौ नित धरम जिहाज। ।१९॥

सेठ सुदर्शन पटना जान, मथुरा से जम्बू निर्वाण।
चरम केवलि पंचमकाल, ते वंदौं नित दीनदयाल। ॥२०॥

तीन लोक के तीरथ जहाँ, नित प्रति वंदन कीजे तहाँ।
मनवचकाय सहित सिरनाय, वंदन करहिं भविक गुणगाय। ॥२१॥

संवत्‌ सतरहसो इकताल, आश्विन सुदी दशमी सुविशाल।
‘भैया’ वंदन करहिं त्रिकाल, जय निर्वाण कांड गुणमाल। ॥२२॥

जिणवाणी स्तुति

मिथ्यातम नाश वे को, ज्ञान के प्रकाश वे को,
आपा पर भास वे को, भानु सी बखानी है॥

छहों द्रव्य जान वे को, बन्ध विधि मान वे को,
स्व-पर पिछान वे को, परम प्रमानी है॥

अनुभव बताए वे को, जीव के जताए वे को,
काहूँ न सताय वे को, भव्य उर आनी है॥

जहाँ तहाँ तार वे को, पार के उतार वे को,
सुख विस्तार वे को यही जिनवाणी है॥

जिनवाणी के ज्ञान से सूझे लोकालोक,
सो वाणी मस्तक धरों, सदा देत हूँ धोक॥

है जिनवाणी भारती, तोहि जपूँ दिन चैन,
जो तेरी शरण गहैं, सो पावे सुख-चैन॥

शांतिपाठ

शांतिपाठ

शांतिनाथ मुख शशि उनहारी, शीलगुणव्रत संयमधारी।
लखन एक सौ आठ विराजे, निरखत नयन कमल दल लाजै।।

पंचम चक्रवर्ती पदधारी, सोलम तीर्थंकर सुखकारी।

इन्द्र नरेन्द्र पूज्य जिननायक, नमो शांतिहित शांति विधायक।।

दिव्य विटप पहुपन की वरषा, दुंदुभि आसन वाणी सरसा।
छत्र चमर भामंडल भारी, ये तुव प्रातिहार्य मनहारी।।

शांति जिनेश शांति सुखदाई, जगत पूज्य पूजों सिरनाई।
परम शांति दीजे हम सबको, पढ़ैं जिन्हें पुनि चार संघ को।।

पूजें जिन्हें मुकुटहार किरीट लाके, इन्द्रादिदेव अरु पूज्यपदाब्ज जाके।
सो शांतिनाथ वर वंश-जगत्प्रदीप, मेरे लिए करहु शांति सदा अनूप।।

संपूजकों को प्रतिपालकों को, यतीनकों को यतिनायकों को।
राजा प्रजा राष्ट्र सुदेश को ले, कीजे सुखी हे जिन शांति को दे।।

होवे सारी प्रजा को सुख, बलयुत हो धर्मधारी नरेशा।
होवे वरषा समय पे, तिलभर न रहे व्याधियों का अन्देशा।।

होवे चोरी न जारी, सुसमय परतै, हो न दुष्काल भारीं।
सारे ही देश धारैं, जिनवर वृषको जो सदा सौख्यकारी।।

घाति कर्म जिन नाश करि, पायो केवलराज।
शांति करो ते जगत में, वृषभादिक जिनराज।।

(तीन बार शांति धारा देवें)

शास्त्रों का हो पठन सुखदा लाभ तत्संगति का।
सद्‍वृत्तों का सुजस कहके, दोष ढाँकूँ सभी का ।।

बोलूँ प्यारे वचन हितके, आपका रूप ध्याऊँ ।
तौलौ सेऊँ चरण जिनके, मोक्ष जौलौं न पाऊँ ।।

तब पद मेरे हिय में, मम हिय तेरे पुनीत चरणों में।
तबलौं लीन रहौ प्रभु, जबलौ पाया न मुक्ति पद मैंने ।।

अक्षर पद मात्रा से दूषित जो कछु कहा गया मुझसे।
क्षमा करो प्रभु सो सब करुणा करिपुनि छुड़ाहु भवदुःख से ।।

हे जगबन्धु जिनेश्वर, पाऊँ तब चरण शरण बलिहारी।
मरणसमाधि सुदुर्लभ, कर्मों का क्षय सुबोध सुखकारी।

(पुष्पांजलि क्षेपण)
(यहाँ नौ बार णमोकार मंत्र का जाप करें)

विसर्जन

बिन जाने वा जान के, रही टूट जो कोय।
तुम प्रसाद तें परम गुरु, सो सब पूरन होय।।
पूजन विधि जानूँ नहीं, नहिं जानूँ आह्वान।
और विसर्जन हूँ नहीं, क्षमा करो भगवान।।
मंत्रहीन धनहीन हूँ, क्रियाहीन जिनदेव ।
क्षमा करहु राखहु मुझे, देहु चरण की सेव ।।

ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं हः अ सि आ उ सा पूजा विधि विसर्जनं करोमि जः जः जः । अपारधम क्षमापनं भवतु भूवात्पुनर्दर्शनम ।
इत्याशीर्वाद

बारह भावना

बारह भावना

भव वन में जी भर घूम चुका, कण, कण को जी भर देखा।

मृग सम मृग तृष्णा के पीछे, मुझको न मिली सुख की रेखा।

अनित्य

झूठे जग के सपने सारे, झूठी मन की सब आशाएँ।

तन-यौवन-जीवन-अस्थिर है, क्षण भंगुर पल में मुरझाए।

अशरण

सम्राट महा-बल सेनानी, उस क्षण को टाल सकेगा क्या।

अशरण मृत काया में हर्षित, निज जीवन डाल सकेगा क्या।

संसार

संसार महा दुःख सागर के, प्रभु दु:ख मय सुख-आभासों में।

मुझको न मिला सुख क्षण भर भी कंचन-कामिनी-प्रासादों में।

एकत्व

मैं एकाकी एकत्व लिए, एकत्व लिए सबहि आते।

तन-धन को साथी समझा था, पर ये भी छोड़ चले जाते।

अन्यत्व

मेरे न हुए ये मैं इनसे, अति भिन्न अखंड निराला हूँ।

निज में पर से अन्यत्व लिए, निज सम रस पीने वाला हूँ।

अशुचि

जिसके श्रंगारों में मेरा, यह महँगा जीवन घुल जाता। अत्यंत अशुचि जड़ काया से, इस चेतन का कैसा नाता।

आव

दिन-रात शुभाशुभ भावों से, मेरा व्यापार चला करता।

मानस वाणी और काया से, आव का द्वार खुला रहता।

सँवर

शुभ और अशुभ की ज्वाला से, झुलसा है मेरा अंतस्तल।

शीतल समकित किरणें फूटें, संवर से आगे अंतर्बल।

निर्जरा

फिर तप की शोधक वह्नि जगे, कर्मों की कड़ियाँ टूट पड़ें।

सर्वांग निजात्म प्रदेशों से, अमृत के निर्झर फूट पड़ें।

लोक

हम छोड़ चलें यह लोक तभी, लोकांत विराजें क्षण में जा।

निज लोग हमारा वासा हो, शोकांत बनें फिर हमको क्या।

बोधि दुर्लभ

जागे मम दुर्लभ बोधि प्रभो! दुर्नयतम सत्वर टल जावे।

बस ज्ञाता-दृष्टा रह जाऊँ, मद-मत्सर मोह विनश जावे।

धर्म

चिर रक्षक धर्म हमारा हो, हो धर्म हमारा चिर साथी।

जग में न हमारा कोई था, हम भी न रहें जग के साथी।

मेरी भावना

मेरी भावना

जिसने राग-द्वेष कामादिक, जीते सब जग जान लिया
सब जीवों को मोक्ष मार्ग का निस्पृह हो उपदेश दिया,
बुद्ध, वीर जिन, हरि, हर ब्रह्मा या उसको स्वाधीन कहो
भक्ति-भाव से प्रेरित हो यह चित्त उसी में लीन रहो। ॥१॥

विषयों की आशा नहीं जिनके, साम्य भाव धन रखते हैं
निज-पर के हित साधन में जो निशदिन तत्पर रहते हैं,
स्वार्थ त्याग की कठिन तपस्या, बिना खेद जो करते हैं
ऐसे ज्ञानी साधु जगत के दुःख-समूह को हरते हैं। ॥२॥

रहे सदा सत्संग उन्हीं का ध्यान उन्हीं का नित्य रहे
उन ही जैसी चर्या में यह चित्त सदा अनुरक्त रहे,
नहीं सताऊँ किसी जीव को, झूठ कभी नहीं कहा करूँ
पर-धन-वनिता पर न लुभाऊँ, संतोषामृत पिया करूँ। ॥३॥

अहंकार का भाव न रखूँ, नहीं किसी पर खेद करूँ
देख दूसरों की बढ़ती को कभी न ईर्ष्या-भाव धरूँ,
रहे भावना ऐसी मेरी, सरल-सत्य-व्यवहार करूँ
बने जहाँ तक इस जीवन में औरों का उपकार करूँ। ॥४॥

मैत्रीभाव जगत में मेरा सब जीवों से नित्य रहे
दीन-दु:खी जीवों पर मेरे उरसे करुणा स्रोत बहे,
दुर्जन-क्रूर-कुमार्ग रतों पर क्षोभ नहीं मुझको आवे
साम्यभाव रखूँ मैं उन पर ऐसी परिणति हो जावे। ॥५॥

गुणीजनों को देख हृदय में मेरे प्रेम उमड़ आवे
बने जहाँ तक उनकी सेवा करके यह मन सुख पावे,
होऊँ नहीं कृतघ्न कभी मैं, द्रोह न मेरे उर आवे
गुण-ग्रहण का भाव रहे नित दृष्टि न दोषों पर जावे। ॥६॥

कोई बुरा कहो या अच्छा, लक्ष्मी आवे या जावे
लाखों वर्षों तक जीऊँ या मृत्यु आज ही आ जावे।
अथवा कोई कैसा ही भय या लालच देने आवे।
तो भी न्याय मार्ग से मेरे कभी न पद डिगने पावे। ॥७॥

होकर सुख में मग्न न फूले दुःख में कभी न घबरावे
पर्वत नदी-श्मशान-भयानक-अटवी से नहिं भय खावे,
रहे अडोल-अकंप निरंतर, यह मन, दृढ़तर बन जावे
इष्टवियोग अनिष्टयोग में सहनशीलता दिखलावे। ॥८॥

सुखी रहे सब जीव जगत के कोई कभी न घबरावे
बैर-पाप-अभिमान छोड़ जग नित्य नए मंगल गावे,
घर-घर चर्चा रहे धर्म की दुष्कृत दुष्कर हो जावे
ज्ञान-चरित उन्नत कर अपना मनुज-जन्म फल सब पावे। ॥९॥

ईति-भीति व्यापे नहीं जगमें वृष्टि समय पर हुआ करे
धर्मनिष्ठ होकर राजा भी न्याय प्रजा का किया करे,
रोग-मरी दुर्भिक्ष न फैले प्रजा शांति से जिया करे
परम अहिंसा धर्म जगत में फैल सर्वहित किया करे। ॥१०॥

फैले प्रेम परस्पर जग में मोह दूर पर रहा करे
अप्रिय-कटुक-कठोर शब्द नहिं कोई मुख से कहा करे,
बनकर सब युगवीर हृदय से देशोन्नति-रत रहा करें
वस्तु-स्वरूप विचार खुशी से सब दु:ख संकट सहा करें। ॥११॥

श्री पार्श्वनाथ स्त्रोत्र

श्री पार्श्वनाथ स्त्रोत्र

नरेन्द्रं फणीन्द्रं सुरेन्द्रं अधीशं । शतेन्द्रं सु पूजैं भजै नाय शीशं ॥
मुनीन्द्रं गणेन्द्रं नमो जोडि हाथं । नमो देव देवं सदापार्श्वनाथ। ॥1॥

गजेन्द्रं मृगेन्द्रं गह्यो तू छुड़ावै । महा आगतैं नागतैं तु बचावै॥
महावीरतैं युध्द में तू जितावै । महा रोगतैं बंधतैं तू छुड़ावै ॥2॥

दु:खी दु:खहर्ता सुखी सुक्खकर्ता । सदा सेवकों को महानन्द भर्ता ।
हरे यक्ष राक्षस भूतं पिशाचं । विषं डांकिनी विघ्न के भय अवाचं ॥3॥

दरिद्रीन को द्रव्यकेदान दीने । अपुत्रीन को तू भलेपुत्र कीने ॥
महासंकटो सेनिकारै विधाता । सबै सम्पदा सर्व को देहि दाता ॥4॥

महाचोर को वज्रको भय निवारैं । महापौन के पुँजतै तू उबारैं ॥
महाक्रोध की अग्नि को मेघ धारा । महा लाभ-शैलेश को वज्र भारा ॥5॥

महा मोह अंधेरेकोज्ञान भानं । महा कर्म कांतार को दौ प्रधानं ॥
किये नाग नागिन अधेलोक स्वामी।हरयो मान तू दैत्य को हो अकामी ॥6॥

तुही कल्पवृक्षं तुही काम धेनं । तुही दिव्य चिंतामणी नाग एनं ॥
पुश नर्क के दु:खतैं तू छुडावैं । महास्वर्गतैं मुक्ति मैं तू बसावै ॥7॥

करै लोह को हेम पाषाण नामी । रटै नामसौं क्यों न हो मोक्षगामी ॥
करै सेव ताकी करैं देव सेवा । सुन बैन सोही लहै ज्ञान मेवा ॥8॥

जपै जाप ताको नहीं पाप लागैं । धरे ध्यानताके सबै दोष भागै ॥
बिना तोहि जाने धरे भव घनेरे । तुम्हारी कृपा तैं सरैं काज मेरे ॥9॥

:: दोहा ::
गणधर इन्द्र न कर सकैं, तुम विनती भगवान ।
‘द्यानत’ प्रीति निहारकैं, कीजै आप समान ॥

जिनवाणी स्तुति

मिथ्यातम नासवे को, ज्ञान के प्रकासवे को,
आपा-पर भासवे को, भानु-सी बखानी है ।
छहों द्रव्य जानवे को, बन्ध-विधि भानवे को,
स्व-पर पिछानवे को, परम प्रमानी है ॥

अनुभव बतायवे को, जीव के जतायवे को,
काहू न सतायवे को, भव्य उर आनी है ।
जहाँ-तहाँ तारवे को, पार के उतारवे को,
सुख विस्तारवे को, ये ही जिनवाणी है ॥

हे जिनवाणी भारती, तोहि जपों दिन रैन,
जो तेरी शरणा गहै, सो पावे सुख चैन ।
जा वाणी के ज्ञान तें, सूझे लोकालोक,
सो वाणी मस्तक नवों, सदा देत हों ढोक ॥

भक्तामर स्तोत्र

आदिपुरुष आदीश जिन, आदि सुविधि करतार।
धरम-धुरंधर परमगुरु, नमों आदि अवतार॥

सुर-नत-मुकुट रतन-छवि करैं, अंतर पाप-तिमिर सब हरैं।
जिनपद बंदों मन वच काय, भव-जल-पतित उधरन-सहाय॥1॥

श्रुत-पारग इंद्रादिक देव, जाकी थुति कीनी कर सेव।
शब्द मनोहर अरथ विशाल, तिस प्रभु की वरनों गुन-माल॥2॥

विबुध-वंद्य-पद मैं मति-हीन, हो निलज्ज थुति-मनसा कीन।
जल-प्रतिबिंब बुद्ध को गहै, शशि-मंडल बालक ही चहै॥3॥

गुन-समुद्र तुम गुन अविकार, कहत न सुर-गुरु पावै पार।
प्रलय-पवन-उद्धत जल-जन्तु, जलधि तिरै को भुज बलवन्तु॥4॥

सो मैं शक्ति-हीन थुति करूँ, भक्ति-भाव-वश कछु नहिं डरूँ।
ज्यों मृगि निज-सुत पालन हेतु, मृगपति सन्मुख जाय अचेत॥5॥

मैं शठ सुधी हँसन को धाम, मुझ तव भक्ति बुलावै राम।
ज्यों पिक अंब-कली परभाव, मधु-ऋतु मधुर करै आराव॥6॥

तुम जस जंपत जन छिनमाहिं, जनम-जनम के पाप नशाहिं।
ज्यों रवि उगै फटै तत्काल, अलिवत नील निशा-तम-जाल॥7॥

तव प्रभावतैं कहूँ विचार, होसी यह थुति जन-मन-हार।
ज्यों जल-कमल पत्रपै परै, मुक्ताफल की द्युति विस्तरै॥8॥

तुम गुन-महिमा हत-दुख-दोष, सो तो दूर रहो सुख-पोष।
पाप-विनाशक है तुम नाम, कमल-विकाशी ज्यों रवि-धाम॥9॥

नहिं अचंभ जो होहिं तुरंत, तुमसे तुम गुण वरणत संत।
जो अधीन को आप समान, करै न सो निंदित धनवान॥10॥

इकटक जन तुमको अविलोय, अवर-विषैं रति करै न सोय।
को करि क्षीर-जलधि जल पान, क्षार नीर पीवै मतिमान॥11॥

प्रभु तुम वीतराग गुण-लीन, जिन परमाणु देह तुम कीन।
हैं तितने ही ते परमाणु, यातैं तुम सम रूप न आनु॥12॥

कहँ तुम मुख अनुपम अविकार, सुर-नर-नाग-नयन-मनहार।
कहाँ चंद्र-मंडल-सकलंक, दिन में ढाक-पत्र सम रंक॥13॥

पूरन चंद्र-ज्योति छबिवंत, तुम गुन तीन जगत लंघंत।
एक नाथ त्रिभुवन आधार, तिन विचरत को करै निवार॥14॥

जो सुर-तिय विभ्रम आरंभ, मन न डिग्यो तुम तौ न अचंभ।
अचल चलावै प्रलय समीर, मेरु-शिखर डगमगै न धीर॥15॥

धूमरहित बाती गत नेह, परकाशै त्रिभुवन-घर एह।
बात-गम्य नाहीं परचण्ड, अपर दीप तुम बलो अखंड॥16॥

छिपहु न लुपहु राहु की छांहि, जग परकाशक हो छिनमांहि।
घन अनवर्त दाह विनिवार, रवितैं अधिक धरो गुणसार॥17॥

सदा उदित विदलित मनमोह, विघटित मेघ राहु अविरोह।
तुम मुख-कमल अपूरव चंद, जगत-विकाशी जोति अमंद॥18॥

निश-दिन शशि रवि को नहिं काम, तुम मुख-चंद हरै तम-धाम।
जो स्वभावतैं उपजै नाज, सजल मेघ तैं कौनहु काज॥19॥

जो सुबोध सोहै तुम माहिं, हरि हर आदिक में सो नाहिं।
जो द्युति महा-रतन में होय, काच-खंड पावै नहिं सोय॥20॥

(हिन्दी में) नाराच छन्द :
सराग देव देख मैं भला विशेष मानिया।
स्वरूप जाहि देख वीतराग तू पिछानिया॥
कछू न तोहि देखके जहाँ तुही विशेखिया।
मनोग चित-चोर और भूल हू न पेखिया॥21॥

अनेक पुत्रवंतिनी नितंबिनी सपूत हैं।
न तो समान पुत्र और माततैं प्रसूत हैं॥
दिशा धरंत तारिका अनेक कोटि को गिनै।
दिनेश तेजवंत एक पूर्व ही दिशा जनै॥22॥

पुरान हो पुमान हो पुनीत पुण्यवान हो।
कहें मुनीश अंधकार-नाश को सुभान हो॥
महंत तोहि जानके न होय वश्य कालके।
न और मोहि मोखपंथ देय तोहि टालके॥23॥

अनन्त नित्य चित्त की अगम्य रम्य आदि हो।
असंख्य सर्वव्यापि विष्णु ब्रह्म हो अनादि हो॥
महेश कामकेतु योग ईश योग ज्ञान हो।
अनेक एक ज्ञानरूप शुद्ध संतमान हो॥24॥

तुही जिनेश बुद्ध है सुबुद्धि के प्रमानतैं।
तुही जिनेश शंकरो जगत्त्रये विधानतैं॥
तुही विधात है सही सुमोखपंथ धारतैं।
नरोत्तमो तुही प्रसिद्ध अर्थ के विचारतैं॥25॥

नमो करूँ जिनेश तोहि आपदा निवार हो।
नमो करूँ सुभूरि-भूमि लोकके सिंगार हो॥
नमो करूँ भवाब्धि-नीर-राशि-शोष-हेतु हो।
नमो करूँ महेश तोहि मोखपंथ देतु हो॥26॥

चौपाई (15 मात्रा)
तुम जिन पूरन गुन-गन भरे, दोष गर्वकरि तुम परिहरे।
और देव-गण आश्रय पाय, स्वप्न न देखे तुम फिर आय॥27॥

तरु अशोक-तर किरन उदार, तुम तन शोभित है अविकार।
मेघ निकट ज्यों तेज फुरंत, दिनकर दिपै तिमिर निहनंत॥28॥

सिंहासन मणि-किरण-विचित्र, तापर कंचन-वरन पवित्र।
तुम तन शोभित किरन विथार, ज्यों उदयाचल रवि तम-हार॥29॥

कुंद-पुहुप-सित-चमर ढुरंत, कनक-वरन तुम तन शोभंत।
ज्यों सुमेरु-तट निर्मल कांति, झरना झरै नीर उमगांति ॥30॥

ऊँचे रहैं सूर दुति लोप, तीन छत्र तुम दिपैं अगोप।
तीन लोक की प्रभुता कहैं, मोती-झालरसों छवि लहैं॥31॥

दुंदुभि-शब्द गहर गंभीर, चहुँ दिशि होय तुम्हारे धीर।
त्रिभुवन-जन शिव-संगम करै, मानूँ जय जय रव उच्चरै॥32॥

मंद पवन गंधोदक इष्ट, विविध कल्पतरु पुहुप-सुवृष्ट।
देव करैं विकसित दल सार, मानों द्विज-पंकति अवतार॥33॥

तुम तन-भामंडल जिनचन्द, सब दुतिवंत करत है मन्द।
कोटि शंख रवि तेज छिपाय, शशि निर्मल निशि करे अछाय॥34॥

स्वर्ग-मोख-मारग-संकेत, परम-धरम उपदेशन हेत।
दिव्य वचन तुम खिरें अगाध, सब भाषा-गर्भित हित साध॥35॥

दोहा :
विकसित-सुवरन-कमल-दुति, नख-दुति मिलि चमकाहिं।
तुम पद पदवी जहं धरो, तहं सुर कमल रचाहिं॥36॥
ऐसी महिमा तुम विषै, और धरै नहिं कोय।
सूरज में जो जोत है, नहिं तारा-गण होय॥37॥

(हिन्दी में) षट्पद :
मद-अवलिप्त-कपोल-मूल अलि-कुल झंकारें।
तिन सुन शब्द प्रचंड क्रोध उद्धत अति धारैं॥
काल-वरन विकराल, कालवत सनमुख आवै।
ऐरावत सो प्रबल सकल जन भय उपजावै॥
देखि गयंद न भय करै तुम पद-महिमा लीन।
विपति-रहित संपति-सहित वरतैं भक्त अदीन॥38॥

अति मद-मत्त-गयंद कुंभ-थल नखन विदारै।
मोती रक्त समेत डारि भूतल सिंगारै॥
बांकी दाढ़ विशाल वदन में रसना लोलै।
भीम भयानक रूप देख जन थरहर डोलै॥
ऐसे मृग-पति पग-तलैं जो नर आयो होय।
शरण गये तुम चरण की बाधा करै न सोय॥39॥

प्रलय-पवनकर उठी आग जो तास पटंतर।
बमैं फुलिंग शिखा उतंग परजलैं निरंतर॥
जगत समस्त निगल्ल भस्म करहैगी मानों।
तडतडाट दव-अनल जोर चहुँ-दिशा उठानों॥
सो इक छिन में उपशमैं नाम-नीर तुम लेत।
होय सरोवर परिन मैं विकसित कमल समेत॥40॥

कोकिल-कंठ-समान श्याम-तन क्रोध जलन्ता।
रक्त-नयन फुंकार मार विष-कण उगलंता॥
फण को ऊँचा करे वेग ही सन्मुख धाया।
तब जन होय निशंक देख फणपतिको आया॥
जो चांपै निज पगतलैं व्यापै विष न लगार।
नाग-दमनि तुम नामकी है जिनके आधार॥41॥

जिस रन-माहिं भयानक रव कर रहे तुरंगम।
घन से गज गरजाहिं मत्त मानों गिरि जंगम॥
अति कोलाहल माहिं बात जहँ नाहिं सुनीजै।
राजन को परचंड, देख बल धीरज छीजै॥
नाथ तिहारे नामतैं सो छिनमांहि पलाय।
ज्यों दिनकर परकाशतैं अन्धकार विनशाय॥42॥

मारै जहाँ गयंद कुंभ हथियार विदारै।
उमगै रुधिर प्रवाह वेग जलसम विस्तारै॥
होयतिरन असमर्थ महाजोधा बलपूरे।
तिस रनमें जिन तोर भक्त जे हैं नर सूरे॥
दुर्जय अरिकुल जीतके जय पावैं निकलंक।
तुम पद पंकज मन बसैं ते नर सदा निशंक॥43॥

नक्र चक्र मगरादि मच्छकरि भय उपजावै।
जामैं बड़वा अग्नि दाहतैं नीर जलावै॥
पार न पावैं जास थाह नहिं लहिये जाकी।
गरजै अतिगंभीर, लहर की गिनति न ताकी॥
सुखसों तिरैं समुद्र को, जे तुम गुन सुमराहिं।
लोल कलोलन के शिखर, पार यान ले जाहिं॥44॥

महा जलोदर रोग, भार पीड़ित नर जे हैं।
वात पित्त कफ कुष्ट, आदि जो रोग गहै हैं॥
सोचत रहें उदास, नाहिं जीवन की आशा।
अति घिनावनी देह, धरैं दुर्गंध निवासा॥
तुम पद-पंकज-धूल को, जो लावैं निज अंग।
ते नीरोग शरीर लहि, छिनमें होय अनंग॥45॥

पांव कंठतें जकर बांध, सांकल अति भारी।
गाढी बेडी पैर मांहि, जिन जांघ बिदारी॥
भूख प्यास चिंता शरीर दुख जे विललाने।
सरन नाहिं जिन कोय भूपके बंदीखाने॥
तुम सुमरत स्वयमेव ही बंधन सब खुल जाहिं।
छिनमें ते संपति लहैं, चिंता भय विनसाहिं॥46॥

महामत गजराज और मृगराज दवानल।
फणपति रण परचंड नीरनिधि रोग महाबल॥
बंधन ये भय आठ डरपकर मानों नाशै।
तुम सुमरत छिनमाहिं अभय थानक परकाशै॥
इस अपार संसार में शरन नाहिं प्रभु कोय।
यातैं तुम पदभक्त को भक्ति सहाई होय॥47॥

यह गुनमाल विशाल नाथ तुम गुनन सँवारी।
विविधवर्णमय पुहुपगूंथ मैं भक्ति विथारी॥
जे नर पहिरें कंठ भावना मन में भावैं।
मानतुंग ते निजाधीन शिवलक्ष्मी पावैं॥
भाषा भक्तामर कियो, हेमराज हित हेत।
जे नर पढ़ैं, सुभावसों, ते पावैं शिवखेत॥48॥

श्री जिनवाणी

श्री जिनवाणी

केवल रवि किरणों से जिसका, सम्पूर्ण प्रकाशित है अंतर

उस श्री जिनवाणी में होता, तत्त्वों का सुंदरतम दर्शन

सद्दर्शन बोध चरण पथ पर, अविरल जो बड़ते हैं मुनि गण

उन देव परम आगम गुरु को , शत शत वंदन शत शत वंदन

इन्द्रिय के भोग मधुर विष सम, लावण्यामयी कंचन काया

यह सब कुछ जड़ की क्रीडा है , मैं अब तक जान नहीं पाया

मैं भूल स्वयं के वैभव को , पर ममता में अटकाया हूँ

अब निर्मल सम्यक नीर लिए , मिथ्या मल धोने आया हूँ

जड़ चेतन की सब परिणति प्रभु, अपने अपने में होती है

अनुकूल कहें प्रतिकूल कहें, यह झूठी मन की वृत्ति है

प्रतिकूल संयोगों में क्रोधित, होकर संसार बड़ाया है

संतप्त हृदय प्रभु चंदन सम, शीतलता पाने आया है

उज्ज्वल हूँ कंठ धवल हूँ प्रभु, पर से न लगा हूँ किंचित भी

फिर भी अनुकूल लगें उन पर, करता अभिमान निरंतर ही

जड़ पर झुक झुक जाता चेतन, की मार्दव की खंडित काया

निज शाश्वत अक्षत निधि पाने, अब दास चरण रज में आया

यह पुष्प सुकोमल कितना है, तन में माया कुछ शेष नही

निज अंतर का प्रभु भेद काहूँ, औस में ऋजुता का लेश नही

चिन्तन कुछ फिर संभाषण कुछ, वृत्ति कुछ की कुछ होती है

स्थिरता निज में प्रभु पाऊं जो, अंतर का कालुश धोती है

अब तक अगणित जड़ द्रव्यों से, प्रभु भूख न मेरी शांत हुई

तृष्णा की खाई खूब भारी, पर रिक्त रही वह रिक्त रही

युग युग से इच्छा सागर में, प्रभु ! गोते खाता आया हूँ

चरणों में व्यंजन अर्पित कर, अनुपम रस पीने आया हूँ

मेरे चैत्यन्य सदन में प्रभु! चिर व्याप्त भयंकर अँधियारा

श्रुत दीप बूझा है करुनानिधि, बीती नही कष्टों की कारा

अतएव प्रभो! यह ज्ञान प्रतीक, समर्पित करने आया हूँ

तेरी अंतर लौ से निज अंतर, दीप जलाने आया हूँ।

जड़ कर्म घुमाता है मुझको, यह मिथ्या भ्रांति रही मेरी

में रागी द्वेषी हो लेता, जब परिणति होती है जड़ की

यों भाव करम या भाव मरण, सदिओं से करता आया हूँ

निज अनुपम गंध अनल से प्रभु, पर गंध जलाने आया हूँ

जग में जिसको निज कहता में, वह छोड मुझे चल देता है

में आकुल व्याकुल हो लेता, व्याकुल का फल व्याकुलता है

में शांत निराकुल चेतन हूँ, है मुक्तिरमा सहचर मेरी

यह मोह तड़क कर टूट पड़े, प्रभु सार्थक फल पूजा तेरी

क्षण भर निज रस को पी चेतन, मिथ्यमल को धो देता है

कशायिक भाव विनष्ट किये, निज आनन्द अमृत पीता है

अनुपम सुख तब विलसित होता, केवल रवि जगमग करता है

दर्शन बल पूर्ण प्रगट होता, यह है अर्हन्त अवस्था है

यह अर्घ्य समर्पण करके प्रभु, निज गुण का अर्घ्य बनाऊंगा

और निश्चित तेरे सदृश प्रभु, अर्हन्त अवस्था पाउंगा

पद्मावती स्त्रोत

पद्मावती स्त्रोत

Padnavati Mata

जिन शासनी हँसासनी पद्मावती माता ।
भुज चार से फल चार दे, पद्मावती माता ।। टेक.।।
जब पार्श्वनाथ जी ने शुक्ल ध्यान आरम्भा ।
कमठेश ने उपसर्ग तब, किया था अचम्भा ।।
निज नाथ सहित, आपके सहाय किया है ।
जिन नाथ को निज माथ पै चढ़ाय लिया है ।।
जिनशासनी.।।१।।

फनतीन सुमन लीन तेरे शीश विराजै ।
जिन राज तहाँ ध्यान धरै आप विराजै ।।
फनेंद्र ने फन की करी जिनेन्द्र पे छाया ।
उपसर्ग वर्ग मेट के आनन्द बढ़ाया ।। जिनशासनी.।।२।।

जिन पार्श्वको हुआ, तभी केवल सुज्ञान है ।
समवसरण की बनी रचना महान है ।।
प्रभु ने किया धर्मार्थ काम मोक्ष दान है ।
तब इन्द्र ने आके किया पूजा विधान है । जिनशासनी.।।३।।

जब से किया तुम पार्श्व के, उपसर्ग का विनाश ।
तब से हुआ जश आपका त्रैलोक में प्रकाश ।।
इन्द्रादि ने भी आपके गुण में किया हुलास ।
किस वास्ते कि इन्द्र खास पार्श्व का है दास ।। जिनशासनी.।।४।।

धर्मानुराग रंग में उमंग भरी हो ।
सन्ध्या समान लाल रंग अंग धरी हो ।
जिन सन्त शील वन्त पै, तुरंत खड़ी हो ।
मनभावनी दरशावनी, आनन्द बड़ी हो ।। जिनशासनी.।।५।।

जिन धर्म की प्रभावना का भाव किया है ।
तिन साथ ने भी आपको सहाय लिया है ।।
तब आपने इस बात को बनाय लिया है ।
जिन धर्म के निशान को फहराय दिया है ।। जिनशासनी.।।६।।

था बोध ने तारा का किया कुम्भ में थापन ।
अकलंक जी से करते रहे बाद वेहापन ।।
तब आपने सहाय किया धाय मात बन ।
तारा का हरा मान हुआ बोध उत्थापन ।। जिनशासनी.।।७।।

इत्यादि जहां धर्म का विवाद पड़ा है ।
तब आपने पर वादियों का मान हरा है ।।
तुमसे ही स्याद्वाद का निशान खरा है ।
इस वास्ते हम आपसे अनुराग धरा है ।। जिनशासनी.।।८।।

तुम शब्द ब्रह्म रूप मंत्र मूर्ति धरैया ।
चिन्तामणी समान कामना की भरैया ।।
जग जाप जोग जैन की सब सिद्ध करैया ।
परवाद के पुरयोग की तत्काल हरैया ।। जिनशासनी.।।९।।

लखि पार्श्वतेरे पास शत्रु त्रासते भाजें ।
अंकुश निहार दुष्ट जुष्ट दर्प को त्याजैं ।।
दुख रूप खर्व गर्व को वह वङ्का हरै है ।
कर कंज में इक कंज सो सुख पुंज भरे है ।। जिनशासनी.।।१०।।

चरणारविन्द में है नूपुरादि आभरन ।
कटि में है सार मेखला प्रमोद की करन ।।
उर में है सुमन माल सुमन भान की माला ।।
षट् रंग अंग संग संग सो है विशाला ।। जिनशासनी.।।११।।

कर कुंज चारु भूषण सों भूरि भरा है ।
भवि वृन्द को आनन्द कन्द पूरि करा है ।।
जुग भान कर्ण कुण्डल सौ जोति धरा है ।
सिर शीश फूल फूल सो अतुल्य भरा है ।। जिनशासनी.।।१२।।

मुख चन्द्र को अमंद देख चन्द्र भी थमा ।
छवि हेर हार हो रहा रम्भा को अचम्भा ।।
दृग तीन सहित लाल तिलक भाल धरे है ।
विकसित मुखारविंद सो आनंद झरे हैं ।। जिनशा.।।१३।।

जो आपको त्रिकाल लाल चाह सो ध्यावे ।
विकराल भूमि पाल उसे भाल झुकावै ।।
जो प्रीति सो प्रतीत और प्रीति बढ़ावै ।
सो रिद्धि सिद्धि वृद्धि नवो निद्धि को पावै ।। जिनशा.।।१४।।

जो दीप दान के विधान से तुम्हें जपै ।
तो पाय के निधान तेज पुंज से दिपै ।।
जो भेद मंत्र वेद में निवेद किया है ।
सो वाध के उपाधि सिद्ध साध लिया है ।। जिनशा.।।१५।।

धन धान्य का अर्थी है सो धन धान्य को पावै ।
सन्तान का अर्थी है सो सन्तान खिलावै ।।
निज राज का अर्थी है सो फिर राज लहावै ।
पद भ्रष्ठ सुपद पाय के मन मोद बढ़ावै ।। जिनशा.।।१६।।

ग्रह व्रूर व्यन्तराल व्याल जाल पूतना ।इ
तुम नाम के सुनत ही सो भागे भूतना ।।
कफ वात पित्त रक्त रोग शोक शाकिनी ।
तुम नाम से डरी मही परात डाकिनी ।। जिनशा.।।१७।।

भयभीत की हरनी है, तुही मात भवानी ।
उपसर्ग दुर्ग द्रावती दुर्गावती रानी ।।
तुम संकटा समस्त कष्ट काटनी दानी ।
सुख सार की करनी तु शंकरीश महारानी ।। जिनशा.।।१८।।

इस वक्त में जिन भक्त को दुख व्यक्त सतावै ।
हे मात तुझे देख के क्या दर्द ना आवे ।।
सब दिन से तो करती रही जिन भक्त पै छाया ।।
किस वास्ते उस बात को ए मात भुलाया ।। जिनशा. ।।१९।।

हो मात मेरे सर्व ही अपराध क्षमा कर ।
होता नहीं क्या बाल से कुचाल यहाँ पर ।।
कुपुत्र तो होते हैं जगत माहि सरासर ।
माता न तजै तिन सौ कभी नेह जन्म भर ।। जिनशा.।।२०।।

अब मात मेरी बात को सब भांति सुधारो ।
मन कामना को सिद्ध करो विघ्न विदारो ।।
मत देर करो मेरी ओर नेक निहारो ।
करकंज की छाया करो दुख दर्द निवारो ।। जिनशा.।।२१।।

ब्रह्ण्डनी सुख मण्डनी खल खण्डनी ख्याता ।
दुख टारि के परिवार सहित दे मुझे साता ।।
तज के विलम्ब अम्बाजी अवलम्ब दीजिए ।
वृष चन्द नन्दवन्द को आनन्द दीजिए ।। जिनशा.।।२२।।

जिन धर्म से डिगने का कहीं आ पड़े कारन ।
तो लीजिए उबार मुझे भक्त उदारन ।।
निज कर्म के संयोग से जिस जौन में जावौ ।
तहाँ दीजिए सम्यक्त्व जो शिव धाम को पावौ ।।

जिन शासनी हंसासनी पद्मावती माता ।
भुज चारतें फल चार दे पद्मावती माता ।।