दहेज में मांगा जैन मंदिर

पिता के स्वर्गवासी हो जाने के कारण छोटी उजम बहन की शादी के अवसर पर होने वाली विधि की जवाबदारी बड़े भाई के ऊपर आई थी। बहन को पिता की गैरहाजरी बिल्कुल लगे नहीं, इस हेतु से भाई ने उसकी शादी का कार्य बड़े ठाठ-बाट से किया। बहिन की विदाई बेला में भाई ने बहन का 9 गाड़ी भरकर विविध सोने-चांदी के आभूषण वस्त्र आदि सभी वस्तुएँ दहेज में दी।

भाई ने वे 9 गाड़ियाँ बहन को बताई और पूछा कि इससे तुझे संतोष है ना? तुझे पिताजी की कमी न लगे इसका मैंने बराबर ध्यान रखा है। अतः बोल, कुछ कमी तो नहीं है? परन्तु बहन तो उदास ही रही। उसके मुंह के ऊपर उदासी थी, यह देखकर भाई ने पुनः पूछा- बहिन और भी कुछ बढ़ाने जैसा लगता हो तो बोल।

यह सुनकर बहिन को विचार आया कि भाई को मेरे संबंध में गलत-फहमी हो रही है, अतः उसे दूर करना चाहिए। अतः बहिन ने कहा भाई-इन 9 गाड़ियों में तूने ऐसी सामग्री भरी है कि जिनको भोगने से संसार बढ़े। हम तो वीतरागी परमात्मा के अनुयायी हैं, भोग सामाग्री से अपने संसार-दुख का निर्माण होता है। मुझे तो इसमें से कुछ नहीं चाहिए। हां भाई! यदि तुम मेरी प्रसन्नता की इच्छा रखते हो तो एक ही कार्य करो। विराट जिनालय का निर्माण करो। यही है मेरी दहेज, इसी में है मेरी प्रसन्नता। यह सुनकर भाई ने दसवीं गाड़ी मंगवाई, वह खाली थी। उसमें एक चिट्ठी रखी और ऊजम बहिन का जैन मन्दिर बनाकर तैयार कराया।

समान स्वभाव में मित्रता

महाराष्ट्र के महान् सन्त गुरु रामदास के अपने आश्रम में एक दिन कुछ बच्चे आ गए। बच्चे उनके साथ खेल रहे थे और वे बच्चों के साथ; सब चहक रहे थे। इतने में एक विद्वान आ पहुँचे। विद्वानों के दिमाग में शास्त्र भरे रहते हैं। उनके हृदय में शास्त्र नहीं रहते। वे शास्त्रों का बोझ सिर्फ दिमाग पर ढोते रहते हैं। वह आया था सन्त रामदास से शास्त्रों पर बात करने, पर देखता है कि इतना बड़ा विद्वान् सन्त बच्चों के साथ खेल रहा है। वह आश्चर्यान्वित मुद्रा में देखता रहा।

सन्त ने कहा- “पण्डित जी, क्या देख रहे हैं, खेल रहा हूँ।”
आगत विद्वान ने कहा- “जी, ठीक है पर, बच्चों के साथ ?”
“बच्चों के साथ नहीं तो क्या बूढ़ों के साथ खेला जाता है? खेल का आनन्द तो बच्चों के साथ ही आता है। निश्छल-निर्मल जैसा मैं, वैसे ही ये। मैं साधना के द्वारा निश्छल-निर्मल बना हूँ और ये सहज प्रकृति से निश्छल हैं। यदि इनके साथ न खेलूं तो बताइए किसके साथ खेलूं ?” सन्त रामदास ने हँसते हुए, विद्वान को खेल का मर्म समझाया।

गीता का रहस्य

एक बार गांधीजी साबरमती आश्रम का निर्माण कर रहे थे तो गुजरात के एक बड़े विद्वान उनके पास आए और कहने लगे, ’’महात्मन! मैं आपके पास रहकर गीता का गूढ़ रहस्य समझना चाहता हूँ ।” महात्मा जी ने उनकी बात सुन ली और उन्होंने रावजी भाई को बुलाया। वे आश्रम की जिम्मेदारी चला रहे थे। रावजी भाई आए तो महात्मा जी ने कहा  “ये गुजरात के प्रख्यात व्यक्ति हैं और अपने पास कोई काम हो तो इन्हें उस पर लगा दें।”

रावजी भाई के पास आश्रम निर्माण का सारा काम था। उन्होंने उनसे कहा कि आप गांधीजी के पास रहना चाहते है तो ईंटें उठाकर रखते जाइये वे कुछ बोल नहीं सके। दो चार रोज तो उन्होंने ईंटें उठाई, फिर तंग आ गए और रावजी भाई से कहने लगे-मेरी तो आपने दुर्दषा कर दी, मजदूर का काम मेरे सुपुर्द कर दिया, मेरा काम यह नहीं है। यह तो मजदूरों का काम है।

वह बात जव गांधीजी के पास गई तो उन्होंने कहा कि यही तो गीता का गूढ़ रहस्य है। आप केवल गादी-तकिये के सहारे बैठकर गीता का गुढ़ रहस्य समझना चाहते हैं तो क्या वो समझ में  आ सकता है। आप अपने कर्त्तव्य को समझें और जिस क्षेत्र में चल रहें हैं, उसकी जिम्मदारी लें तो वह गूढ़ रहस्य समझ में आ सकता है।

अर्घावतारन असिप्रहारन में सदा समता धरन

महाराज श्रेणिक ने धर्म विद्वेषवश यशोधर मुनिराज के गले में एक मरा हुआ सर्प डाल दिया और राजभवन में जाकर चेलना को यह समाचार सुनाया। यह दुखद समाचार सुनते ही अत्यन्त ही दुखी होकर चेलना विलाप करने लगी। यह देखकर श्रेणिक ने कहा – देवी! इसमें रोने और दुखी होने की क्या बात है? उन्होंने तो कभी का उसे निकालकर फेंक दिया होगा।

यह सुनकर चेलना बोल उठी – राजन्! अनर्थ! घोर अनर्थ! तुमने जो उनको दुख देने का प्रयत्न किया है, वीतरागी दिगम्बर साधु उस दुख से बचने के लिये उसे निकालकर कभी नहीं फेंक सकते क्योंकि उनको सुख दुख की सभी सामग्री एक समान है। वे इसे दुख ही नहीं मानते हैं। इस बात का विश्वास करने के लिये राजा रानी मुनिराज यशोधर के पास पहुँचे। वहाँ पहुँच कर देखा तो  लाखों चीटियों ने सारे बदन में काट-काटकर फुटबॉल जैसा फुला दिया है। चेलना ने जमीन पर चीनी डालकर चीटियों को उतारा और साँप निकलवाकर अलग किया। उपसर्ग दूर हुआ समझकर मुनिराज ने अपनी समाधि खोली। राजा रानी ने मुनिराज के चरणों मे नमस्कार किया। मुनिराज के सामने दोनों शत्रु मित्र होते हुए भी दोनों को समान रूप से सहर्ष शुभाशीर्वाद दिया। “तुम दोनों का कल्याण हो” राजा श्रेणिक इस महान् वीतरागी संत का अपूर्व समताभाव देखकर चरणों गिर क्षमा याचना करने लगा। धन्य हैं रत्नत्रयधारी वीतरागी सन्तों की समतादृष्टि! इस समताभाव से श्रेणिक इतने प्रभावित हुये कि वे जैन धर्म के दृढ़श्रद्धानी बन गये। उन्होंने भगवान महावीर स्वामी के समवसरण में क्षायिक  सम्यक्दर्षन प्राप्त कर  तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया। वे उत्सर्पिणी काल के महापद्म नामक प्रथम तीर्थंकर बनकर स्वयं संसार से मुक्त होगे और अनन्तजीवों के आत्मोद्धार में आदर्श बनेंगे।

सच्ची भविष्यवाणी

एक सेठ बहुत धनवान थे। उन्हें धन का बहुत घमंड था। एक दिन वे मुनिराज को पास पहुंचे और नमस्कार कर कहने लगे, स्वामिन्! आप तो विशेष ज्ञानी हैं, कुछ भविष्य की भी जानते होंगे।

मुनिराज ने कहा – मैं तो भविष्यवक्ता हूँ। मेरी वाणी कोई भी क्या, सर्वज्ञ भी अन्यथा सिद्ध नहीं कर सकते।

सेठ – बोले प्रभु, तब मेरा भविष्य बतलाने की महती कृपा करे।

मुनिराज ने कहा- मेरी सच्ची भविष्यवाणी सुनिये -आप यह सब ठाट बाट छोड़कर अवश्य मरेंगे। इसे कोई अन्यथा नहीं कर सकता, यह परम सत्य है। सेठ अवाक रह गया।

जो बिन ज्ञान क्रिया अवगाहें

राजा को अपना बाग बहुत प्रिय था। उसने परदेश जाते समय राजकुमार को बाग की देख -रेख सोंप दी। राजकुमार ने माली से कहा – इन पेड़ो के पत्तों को ऐसे स्वच्छ साफ रखो कि ये चमकते रहें। इनकी रोज धुलाई करो। राजकुमार के सामने उनकी रोज धुलाई होने लगी किन्तु गमले के सभी पोधे सुखने लगे। राजा ने आकर कहा-राजकुमार! तुमने इन पौधो को क्यों सुखा डाला? राजकुमार ने कहा – मैंने तो इनकी रोज सफाई कराई। राजा ने कहा – तुमने तो वैसे ही मूर्खता की कि जैसे लोग क्रिया काण्ड करते रहते हैं, मूल आत्म-स्वभाव की तरफ देखते ही नहीं ।

पूज्य- शरीर या गुण

एक बार एक द्वेषी मनुष्य ने अपने शिष्यों से कहा- “ये जैन मुनि कितने गन्दें रहते हैं। कभी नहाते नहीं। इनसे तो सदा दूर ही रहना चाहिये”। किसी जैन भाई ने यह सुना। वे उसके पास पहुंचे और बोले- “महानुभाव !गाय कभी नहाती नहीं है और भेंस सदा पानी में ही पड़ रहती है। बताइये, इन दोंनो में  पवित्र कौन है?  आप किसे पूज्य मानते हैं?” वास्तव में संगति करने के योग्य वह होते हैं, जिनका मन और जीवन पवित्र होता है। तन की पवित्रता से आत्मा का कोई संबंध नहीं है। मन चंगा तो कठोती में गंगा। बेचारा वह मनुष्य अब क्या जवाब दे!

जैसी दृष्टि – वैसी सृष्टि

एक राजा एक पंसारी को देखकर उसके सादर वन्दना करने पर भी उससे घृणा ही करता था। राजा ने मंत्री से इसका कारण पूछा। मन्त्री ने राजा की सब बात पंसारी को बता कर पूछा – सच बताओ क्या बात है?
पंसारी ने कहा – “जान बख्शी जाय, राजा साहब पिछले दिनों मे बहुत बीमार हो गये थे। बचने की कोई आशा न रही। तब मैंने यह देखों चौदह मन चंदन खरीद लिया था। राजा साहब अच्छे हो गए तो चन्दन अब तक पड़ा है। एक बहुत बड़ी रकम खटाई में पड़ गई है।”
मन्त्री ने वह सब चन्दन बाजार भाव में उस से खरीद लिया। राजा फिर उस की दुकान के आगे आये मगर उसके हृदय में पंसारी के विरुद्ध भाव न हुए। राजा ने कारण मन्त्री से पूछा तो उसने कहा? जिस कारण से उसके हृदय में आपके विरुद्ध भाव होते थे और उन भाव के आकर्षण से आपके भाव मलिन हो जाते थे, मैंने उस कारण को ही अब मिटा दिया है।

 

भगवान महावीर और उनका जीवन-दर्शन

जैनधर्म के इस युग के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ ऋषभदेव के पौत्र मारीचि से लेकर अन्तिम तीर्थंकर भगवान महावीर के भव तक की जीवन यात्रा किसी आत्मा के अपने मिथ्या अहंकार एवं अज्ञान जनित विकारी वृत्तियों के फल में संसार परिभ्रमण की तथा उससे मुक्ति की विचित्र ही कथा है। करोड़ों करोड़ों भव विभिन्न योनियों में बिताने के बाद महावीर के अन्तिम भव से पूर्व के दसवें भव में सिंह की योनि में उन्हें चारण ऋद्धिधारी मुनियों से आत्महित प्रेरक उद्बोधन मिला और उस सिंह योनि से भगवान महावीर के आत्मा की विकास यात्रा प्रारम्भ हुई। अन्तिम भव में वैशाली गणतन्त्र के कुण्डग्राम में राजा सिद्धार्थ व महारानी प्रियकारिणी त्रिशला के घर में चैत्र शुक्ला त्रयोदशी के दिन बालक वर्धमान के रूप में उस पवित्र आत्मा ने जन्म लिया। जैसा कि सभी तीर्थंकरों के जीवन में होता है उनके भी गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान व मोक्ष कल्याणक देवों व मानवों के द्वारा अति उत्साह व भक्ति से मनाये गये। हो भी क्यों नहीं? जब सामान्य व्यक्ति के जीवन में भी उत्सवों की कमी नहीं होती तो उन महापुरूष के जीवन की मुख्य घटनाओं पर उत्सव होना स्वाभाविक ही है क्योंकि वे इस युग के अन्तिम तीर्थंकर थे और भविष्य में मुक्ति मार्ग उनके उपदेशों से ही जीवित रहना था।

Mahaveer

सभी जानते हैं कि ३० वर्ष की आयु में उन्होंने राजपाट त्याग कर श्रमण साधना का मार्ग अंगीकार किया। १२ वर्ष तक कठोर एवं मौन तपश्चरण के बाद ४२ वर्ष की आयु में उन्हें केवलज्ञान (सर्वज्ञता) की प्राप्ति हुई और इस प्रकार वे अपने सम्पूर्ण ही राग-द्वेषादि विकारों का अभाव कर अर्हन्त परमात्मा बन गये। उनके उपदेशों का क्रम उसके बाद अनवरत ३० वर्ष तक चलता रहा और कार्तिक कृष्ण अमावस्या के दिन की प्रात: बेला में उन्होंने संसार चक्र से मुक्ति प्राप्त की और सिद्ध हो गये। सिद्ध दशा एक ऐसी दशा है जहां से आत्मा कभी लौट कर संसार में नहीं आता, अनन्त भविष्य काल में वह अपने आत्मिक आनन्द का उपभोग करता रहता है। यह वैसे ही है जैसे कि शुद्ध स्वर्ण पिण्ड स्वयमेव कभी अशुद्ध नहीं होता।

भगवान महावीर का यह जीवन और उनकी शिक्षाएं भी जगत के सभी प्राणियों के लिये अत्यन्त प्रेरणादायक एवं जागतिक कष्टों से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाली हैं।

भगवान महावीर की शिक्षाएं सर्व कल्याण कारी हैं, सर्वोदयी हैं। उनके अनुपालन से न केवल जीवों का मुक्ति का मार्ग ही प्रशस्त होता है वरन् सामान्य लोक जीवन भी सुन्दर हो जाता है। उनके उपदेशों में सामान्यतया अहिंसा, अनेकान्त व स्याद्वाद, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, सत्य व अचौर्य की चर्चा की जाती है। परन्तु उनके उपदेशों का जो लोकोत्तर पहलू है, वह है पदार्थ की अनन्त गुण सम्पन्नता, परिणमन (अवस्था परिवर्तन) की स्वतन्त्रता, पर द्रव्यों के कर्तृत्व का अभाव और प्रत्येक आत्मा में परमात्मा बनने की शक्ति व सामर्थ्य की घोषणा।

भगवान महावीर का मारीचि से लेकर वर्तमान भव तक का जीवन वस्तु स्वरूप की स्वतन्त्रता तथा निमित्तों की अकिंचित्करता (कार्य में अकारणता) की घोषणा करता है। उन्होंने कहा कि जगत की सभी आत्माएं समान हैं और अपने विकारों का अभाव कर पूर्ण शुद्ध स्वरूप को प्रगट करने में समर्थ हैं। उन्होंने कहा कि आत्मा स्वभाव से अनन्त ज्ञान दर्शनादि शक्तियों से परिपूर्ण है, वह आनन्द मय है, आनन्द का कोष है उसे आनन्द कहीं से लाना नहीं पड़ता। जैसे ही आत्मा पर द्रव्यों से दृष्टि हटाकर अपने ज्ञान को निज आत्म केन्द्रित करता है उसे अतीन्द्रिय निर्विकल्प आनन्द की अनुभूति होती है। उसे अपने सुख के लिये कहीं बाहर तलाशने की आवश्यकता ही नहीं है। और इस आत्मानुभूति के साथ ही मुक्ति के मार्ग का प्रारम्भ हो जाता है।

इस मुक्ति के मार्ग का प्रारम्भ स्वयं की आत्म सत्ता की पूर्णता के स्वीकार के साथ ही होता है क्योंकि जब तक आत्मा स्वयं को अपूर्ण मानता रहेगा तब तक बाहरी पदार्थों से अपना हित अहित मानते रहने के कारण इष्ट के संग्रह और अनिष्ट के त्याग के निरर्थक प्रयत्नों में ही लगा रहेगा तथा पदार्थों का मनोनुकूल संग्रह व त्याग अशक्य होने से निरन्तर आकुलित ही रहेगा।

इसलिये भगवान महावीर ने इस बात पर सर्वाधिक बल दिया कि आत्मा ही नहीं जगत का प्रत्येक ही द्रव्य स्वयं पूर्ण, परनिरपेक्ष व स्वतन्त्र है तथा जो विकार हमें अज्ञानजनित राग-द्वेष मोहादिक के रूप में आत्मा में नजर आता है वह भी उसका स्वभाव नहीं है, यह विकार स्वभाव के ऊपर-ऊपर ही रहता है। इसीलिये आत्मा का स्वभाव उससे अप्रभावित शुद्ध ही पड़ा रहता है, इसी कारण अनन्त जागतिक प्रतिकूलताओं के बीच भी आत्म स्वभाव अक्षुण्ण रहता है। अनन्त भूतकाल की विषमतम परिस्थितियों में भी यदि आत्मा अपने अस्तित्व रूप से सदा विद्यमान रहता आया है तो यह आत्मा की अनन्त गुणात्मकता के बिना संभव नहीं हो सकता।

विकारों की अनादि श्रृंखला के मध्य आत्मा किस प्रकार शुद्ध रह सकता है यह एक स्वाभाविक प्रश्न है।

एक सिंह शावक की कहानी से तो सभी परिचित होंगे ही कि किस प्रकार वह अपने परिवार से बिछुड़कर भेड़ों के झुण्ड में चला गया और भेड़ों के साथ ही रहते हुये तथा स्वयं को उन जैसा ही समझते हुये बड़ा होने लगा। एक दिन नदी किनारे पानी पीते हुये उसे दूसरे किनारे पर खड़े हुये एक सिंह ने देखा और वह उस सिंह शावक को भेड़ों के झुण्ड के साथ देखकर चकित रह गया। उसे यह समझते देर नहीं लगी कि यह सिंह शावक गलती से ही भेड़ों के साथ चला गया है और अपने स्वरूप एवं सामर्थ्य को भी भूल गया है। हम जानते हैं कि सिंह ने बाद में शावक के पास जाकर उसे अपना व स्वयं का स्वरूप नदी के पानी में परछांई के रूप में दिखाया, तब सिंह शावक तुरन्त ही यह समझ गया कि वह भेड़ों की जाति का नहीं है, अपने हितैषी उस सिंह की जाति का है। और इस विश्वास के साथ ही जब उसने पूरी शक्ति से दहाड़ भरी तो सदैव साथ रहने वाला भेड़ों का झुण्ड भयभीत होकर तितर बितर हो गया। शीघ्र ही उस शावक ने भी सिंह के साथ छलांग लगाई और सिंहों के झुण्ड में शामिल हो गया। यह स्पष्ट ही है कि अपने सिंहत्व की शक्ति को पहचानने स्वीकारने मात्र से ही उसकी दीनता समाप्त हो गई और वह अपने स्वभाव भूत सिंह की शक्तियों की अनुभूति एवं आनन्द पूर्वक रहने लगा। उसे अपने में सिंहत्व की शक्ति कहीं बाहर से नहीं लानी पड़ी।

इसी प्रकार खान से निकले हुये कोयले से आवृत्त हीरे में बाहर से काला दिखने पर भी आन्तरिक सौंदर्य एवं चमक पूरी की पूरी विद्यमान होती है। जरूरत केवल बाहृय कालिमा को हटाने की है सर्वांगसुन्दर हीरा अपने दैदीप्यमान रूप में स्वत: ही प्रगट हो जाता है। खान से निकली पत्थर की शिला में प्रतिमा छिपी होती है जिसे पारखी व कुशल कारीगर पहचान लेता है और बाहरी आवरण- अतिरिक्त पत्थर हटा देने पर वह सर्वांगसुन्दर प्रतिमा प्रगट हो जाती है जो प्रतिष्ठित होने पर जगत पूज्य बन जाती है।

भगवान महावीर कहते हैं कि जिस प्रकार सिंह शावक में सिंहत्व, हीरे के पत्थर में हीरा तथा पत्थर की शिला में देव प्रतिमा स्वाभाविक रूप से ही विद्यमान है उसी प्रकार इस आत्मा में भी परमात्मा बनने की सामर्थ्य सहज रूप से ही विद्यमान है, आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम अपनी शक्ति को पहचानें और तदनुरूप आचरण करें।

उक्त उदाहरणों में सिंह शावक को कुछ करना नहीं था। केवल अपनी शक्ति को अपने सिंहत्व को स्वीकार मात्र करना था। अपने स्वरूप की यह अजानकारी ही उसकी दीनता का मूल कारण थी। इसी प्रकार ज्ञान-दर्शन-सुख-वीर्य आदि अनन्त सामर्थ्य से परिपूर्ण यह आत्मा यदि अपनी शक्ति को पहचान कर राग-द्वेष मोहादि विकारी वृत्तियों से मुक्त हो जावे तो यह भी परमात्मा बन सकता है। निर्विकार आत्मा ही सर्वोत्कृष्ट आत्मा-परमात्मा कहे जाते हैं।

जब विरोध करने आये और नतमस्तक हो गए

*आचार्य श्री १०८ विद्यासागर जी महामुनिराज* अपने संघ के साथ विहार करते हुये एक बंगाल के छोटे से शहर में आये आचार्य श्री का नगर प्रवेश होने वाला था तो समाज के कुछ लोग उनकी अगवानी करने आ गए, सुबह का समय था जैसे ही आचार्य श्री शहर की सीमा में आये कुछ अजैन लोग गुरुदेव और उनके संघ को बुरा भला बोलने लगे और उनका पीछा करने लगे, परन्तु आचार्य श्री के साथ समाज के कुछ लोग चल रहे थे इसलिये ज्यादा कुछ नही कहा_

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*_आचार्य श्री वहाँ एक धर्मशाला में रुके और वही पास में मन्दिर के दर्शन करके धर्मशाला में ही आचार्य संघ की आहार चर्या सम्पन्न हुई, जब तक बाहर कुछ और असामाजिक लोग इकट्ठे होने लगे और जैन समाज के लोगों से भी झगड़ा करने लगे, आहार के बाद आचार्य श्री संघ ने सामायिक किया, सामायिक के बाद आचार्य श्री ने विहार करने के लिये समाज के लोगों से कहा, लेकिन वहाँ उपस्थित लोगों ने गुरुदेव से आग्रह किया की आज मत जाइए बाहर बहुत लोग खड़े हैं और आपके बारे में बुरा भला बोल रहे हैं_*
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_परन्तु आचार्य भगवन को इन सब बातों की क्या चिंता थी, उन्होंने कहा समाज का कोई व्यक्ति हमारे साथ नही चलेगा ना आगे ना पीछे, परन्तु संघस्थ मुनिराजों को थोड़ी घवराहट हो रही थी( ऐसा भी मुनि श्री ने बताया) लेकिन गुरु आज्ञा कैसे टालते, आचार्य श्री ने कहा कोई ऊपर नही देखगा सब लोग नीचे निगाहें करके मेरे पीछे चलेंगे, आचार्य श्री अपने संघ सहित धर्मशाला के मुख्य द्धार पर आये और नीची निगाहों हल्का सा देखा तो दूर दूर तक हुड़दंगी पुरुषों की भीड़ दिखी, कोई चिल्ला रहा कोई कुछ बोल रहा, आचार्य श्री आगे बड़े…_
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*_और जैसे ही आचार्य भगवन भीड़ के बीच पहुंचे तो पूरे माहोल में एकदम सन्नाटा हो गया… अभी कुछ क्षण पहले लोग चिल्ला रहे थे, लेकिन अब ये क्या हुआ एकदम इतना सन्नाटा…. आचार्य भगवन आगे बढ़ते गए और भीड़ तो जैसे दो हिस्सों में बंटती चली गयी, सभी मुनिराज गुरुदेव के चरणों के निशान पर चरण रखकर आगे बढ़ते चले गए, और ऐसी ही भीड़ लगभग 2 किलो मीटर तक रही, उसके बाद कम होती गई, जब शहर के बाहर आ गए तो समाज के लोग भी वहाँ पहुंच चुके थे, सभी लोग आचार्य भगवन के चरणों गिर गए और नेत्रों से तेज अश्रुधारा बहने लगी,वहाँ से विहार करके आचार्य श्री संघ अन्य किसी स्थान पर रात्री विश्राम को रुके और सब ठीक हो गया_*
*_🙏🏻धन्य है गुरु की महिमा🙏🏻_*

पश्चिम बंगाल के किसी शहर की घटना है.
मुनि श्री १०८ क्षमा सागर जी महाराज ने प्रवचन में सुनाई थी ये घटना.