समान स्वभाव में मित्रता

महाराष्ट्र के महान् सन्त गुरु रामदास के अपने आश्रम में एक दिन कुछ बच्चे आ गए। बच्चे उनके साथ खेल रहे थे और वे बच्चों के साथ; सब चहक रहे थे। इतने में एक विद्वान आ पहुँचे। विद्वानों के दिमाग में शास्त्र भरे रहते हैं। उनके हृदय में शास्त्र नहीं रहते। वे शास्त्रों का बोझ सिर्फ दिमाग पर ढोते रहते हैं। वह आया था सन्त रामदास से शास्त्रों पर बात करने, पर देखता है कि इतना बड़ा विद्वान् सन्त बच्चों के साथ खेल रहा है। वह आश्चर्यान्वित मुद्रा में देखता रहा।

सन्त ने कहा- “पण्डित जी, क्या देख रहे हैं, खेल रहा हूँ।”
आगत विद्वान ने कहा- “जी, ठीक है पर, बच्चों के साथ ?”
“बच्चों के साथ नहीं तो क्या बूढ़ों के साथ खेला जाता है? खेल का आनन्द तो बच्चों के साथ ही आता है। निश्छल-निर्मल जैसा मैं, वैसे ही ये। मैं साधना के द्वारा निश्छल-निर्मल बना हूँ और ये सहज प्रकृति से निश्छल हैं। यदि इनके साथ न खेलूं तो बताइए किसके साथ खेलूं ?” सन्त रामदास ने हँसते हुए, विद्वान को खेल का मर्म समझाया।

गीता का रहस्य

एक बार गांधीजी साबरमती आश्रम का निर्माण कर रहे थे तो गुजरात के एक बड़े विद्वान उनके पास आए और कहने लगे, ’’महात्मन! मैं आपके पास रहकर गीता का गूढ़ रहस्य समझना चाहता हूँ ।” महात्मा जी ने उनकी बात सुन ली और उन्होंने रावजी भाई को बुलाया। वे आश्रम की जिम्मेदारी चला रहे थे। रावजी भाई आए तो महात्मा जी ने कहा  “ये गुजरात के प्रख्यात व्यक्ति हैं और अपने पास कोई काम हो तो इन्हें उस पर लगा दें।”

रावजी भाई के पास आश्रम निर्माण का सारा काम था। उन्होंने उनसे कहा कि आप गांधीजी के पास रहना चाहते है तो ईंटें उठाकर रखते जाइये वे कुछ बोल नहीं सके। दो चार रोज तो उन्होंने ईंटें उठाई, फिर तंग आ गए और रावजी भाई से कहने लगे-मेरी तो आपने दुर्दषा कर दी, मजदूर का काम मेरे सुपुर्द कर दिया, मेरा काम यह नहीं है। यह तो मजदूरों का काम है।

वह बात जव गांधीजी के पास गई तो उन्होंने कहा कि यही तो गीता का गूढ़ रहस्य है। आप केवल गादी-तकिये के सहारे बैठकर गीता का गुढ़ रहस्य समझना चाहते हैं तो क्या वो समझ में  आ सकता है। आप अपने कर्त्तव्य को समझें और जिस क्षेत्र में चल रहें हैं, उसकी जिम्मदारी लें तो वह गूढ़ रहस्य समझ में आ सकता है।

सच्ची भविष्यवाणी

एक सेठ बहुत धनवान थे। उन्हें धन का बहुत घमंड था। एक दिन वे मुनिराज को पास पहुंचे और नमस्कार कर कहने लगे, स्वामिन्! आप तो विशेष ज्ञानी हैं, कुछ भविष्य की भी जानते होंगे।

मुनिराज ने कहा – मैं तो भविष्यवक्ता हूँ। मेरी वाणी कोई भी क्या, सर्वज्ञ भी अन्यथा सिद्ध नहीं कर सकते।

सेठ – बोले प्रभु, तब मेरा भविष्य बतलाने की महती कृपा करे।

मुनिराज ने कहा- मेरी सच्ची भविष्यवाणी सुनिये -आप यह सब ठाट बाट छोड़कर अवश्य मरेंगे। इसे कोई अन्यथा नहीं कर सकता, यह परम सत्य है। सेठ अवाक रह गया।

जो बिन ज्ञान क्रिया अवगाहें

राजा को अपना बाग बहुत प्रिय था। उसने परदेश जाते समय राजकुमार को बाग की देख -रेख सोंप दी। राजकुमार ने माली से कहा – इन पेड़ो के पत्तों को ऐसे स्वच्छ साफ रखो कि ये चमकते रहें। इनकी रोज धुलाई करो। राजकुमार के सामने उनकी रोज धुलाई होने लगी किन्तु गमले के सभी पोधे सुखने लगे। राजा ने आकर कहा-राजकुमार! तुमने इन पौधो को क्यों सुखा डाला? राजकुमार ने कहा – मैंने तो इनकी रोज सफाई कराई। राजा ने कहा – तुमने तो वैसे ही मूर्खता की कि जैसे लोग क्रिया काण्ड करते रहते हैं, मूल आत्म-स्वभाव की तरफ देखते ही नहीं ।

पूज्य- शरीर या गुण

एक बार एक द्वेषी मनुष्य ने अपने शिष्यों से कहा- “ये जैन मुनि कितने गन्दें रहते हैं। कभी नहाते नहीं। इनसे तो सदा दूर ही रहना चाहिये”। किसी जैन भाई ने यह सुना। वे उसके पास पहुंचे और बोले- “महानुभाव !गाय कभी नहाती नहीं है और भेंस सदा पानी में ही पड़ रहती है। बताइये, इन दोंनो में  पवित्र कौन है?  आप किसे पूज्य मानते हैं?” वास्तव में संगति करने के योग्य वह होते हैं, जिनका मन और जीवन पवित्र होता है। तन की पवित्रता से आत्मा का कोई संबंध नहीं है। मन चंगा तो कठोती में गंगा। बेचारा वह मनुष्य अब क्या जवाब दे!

जैसी दृष्टि – वैसी सृष्टि

एक राजा एक पंसारी को देखकर उसके सादर वन्दना करने पर भी उससे घृणा ही करता था। राजा ने मंत्री से इसका कारण पूछा। मन्त्री ने राजा की सब बात पंसारी को बता कर पूछा – सच बताओ क्या बात है?
पंसारी ने कहा – “जान बख्शी जाय, राजा साहब पिछले दिनों मे बहुत बीमार हो गये थे। बचने की कोई आशा न रही। तब मैंने यह देखों चौदह मन चंदन खरीद लिया था। राजा साहब अच्छे हो गए तो चन्दन अब तक पड़ा है। एक बहुत बड़ी रकम खटाई में पड़ गई है।”
मन्त्री ने वह सब चन्दन बाजार भाव में उस से खरीद लिया। राजा फिर उस की दुकान के आगे आये मगर उसके हृदय में पंसारी के विरुद्ध भाव न हुए। राजा ने कारण मन्त्री से पूछा तो उसने कहा? जिस कारण से उसके हृदय में आपके विरुद्ध भाव होते थे और उन भाव के आकर्षण से आपके भाव मलिन हो जाते थे, मैंने उस कारण को ही अब मिटा दिया है।

 

जब विरोध करने आये और नतमस्तक हो गए

*आचार्य श्री १०८ विद्यासागर जी महामुनिराज* अपने संघ के साथ विहार करते हुये एक बंगाल के छोटे से शहर में आये आचार्य श्री का नगर प्रवेश होने वाला था तो समाज के कुछ लोग उनकी अगवानी करने आ गए, सुबह का समय था जैसे ही आचार्य श्री शहर की सीमा में आये कुछ अजैन लोग गुरुदेव और उनके संघ को बुरा भला बोलने लगे और उनका पीछा करने लगे, परन्तु आचार्य श्री के साथ समाज के कुछ लोग चल रहे थे इसलिये ज्यादा कुछ नही कहा_

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*_आचार्य श्री वहाँ एक धर्मशाला में रुके और वही पास में मन्दिर के दर्शन करके धर्मशाला में ही आचार्य संघ की आहार चर्या सम्पन्न हुई, जब तक बाहर कुछ और असामाजिक लोग इकट्ठे होने लगे और जैन समाज के लोगों से भी झगड़ा करने लगे, आहार के बाद आचार्य श्री संघ ने सामायिक किया, सामायिक के बाद आचार्य श्री ने विहार करने के लिये समाज के लोगों से कहा, लेकिन वहाँ उपस्थित लोगों ने गुरुदेव से आग्रह किया की आज मत जाइए बाहर बहुत लोग खड़े हैं और आपके बारे में बुरा भला बोल रहे हैं_*
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_परन्तु आचार्य भगवन को इन सब बातों की क्या चिंता थी, उन्होंने कहा समाज का कोई व्यक्ति हमारे साथ नही चलेगा ना आगे ना पीछे, परन्तु संघस्थ मुनिराजों को थोड़ी घवराहट हो रही थी( ऐसा भी मुनि श्री ने बताया) लेकिन गुरु आज्ञा कैसे टालते, आचार्य श्री ने कहा कोई ऊपर नही देखगा सब लोग नीचे निगाहें करके मेरे पीछे चलेंगे, आचार्य श्री अपने संघ सहित धर्मशाला के मुख्य द्धार पर आये और नीची निगाहों हल्का सा देखा तो दूर दूर तक हुड़दंगी पुरुषों की भीड़ दिखी, कोई चिल्ला रहा कोई कुछ बोल रहा, आचार्य श्री आगे बड़े…_
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*_और जैसे ही आचार्य भगवन भीड़ के बीच पहुंचे तो पूरे माहोल में एकदम सन्नाटा हो गया… अभी कुछ क्षण पहले लोग चिल्ला रहे थे, लेकिन अब ये क्या हुआ एकदम इतना सन्नाटा…. आचार्य भगवन आगे बढ़ते गए और भीड़ तो जैसे दो हिस्सों में बंटती चली गयी, सभी मुनिराज गुरुदेव के चरणों के निशान पर चरण रखकर आगे बढ़ते चले गए, और ऐसी ही भीड़ लगभग 2 किलो मीटर तक रही, उसके बाद कम होती गई, जब शहर के बाहर आ गए तो समाज के लोग भी वहाँ पहुंच चुके थे, सभी लोग आचार्य भगवन के चरणों गिर गए और नेत्रों से तेज अश्रुधारा बहने लगी,वहाँ से विहार करके आचार्य श्री संघ अन्य किसी स्थान पर रात्री विश्राम को रुके और सब ठीक हो गया_*
*_🙏🏻धन्य है गुरु की महिमा🙏🏻_*

पश्चिम बंगाल के किसी शहर की घटना है.
मुनि श्री १०८ क्षमा सागर जी महाराज ने प्रवचन में सुनाई थी ये घटना.

चर्मचक्षु और ज्ञानचक्षु

एक बार बीरबल और अकबर में यह सवाल उठा कि संसार में आँखों वाले अधिक हैं या अन्धे? बीरबल ने कहा कि कौन अधिक हैं, वह प्रत्यक्ष दिखायेगा। उसने अपने सिर पर एक कपड़ा लपेटा और दरबार में बगल में बैठे व्यक्ति से पूछा -“मेरे सिर पर क्या है?” उस आदमी ने जवाब दिया-“पगड़ी।”

बीरबल ने वह कपड़ा सिर से उतार कर, दूसरे से पूछा-“यह क्या है?” “दुपट्टा है?” उस व्यक्ति ने कहा।

थोड़ी देर बाद उसी कपडे़ को पहिन कर, उसने दरबार में एक और व्यक्ति से पूछा -“यह क्या है?” “धोती” उस व्यक्ति ने कहा।

“अन्घे सब अन्धे हैं। यह कपड़ा है। इसको एक ने पगड़ी बताया, दूसरे ने दुपट्टा कहा और तीसरे ने इसको धोती समझा।” बीरबल ने कहा

अकबर यह सुन खुश हुआ। इसी प्रकार चिंवटी, हाथी और मनुष्य का भेद जड़बुद्धि में है। विवेक बुद्धि में ये सब “कारण परमात्मा” हैं। मुक्ति के पात्र होने से आदरणीय है।

आत्म विश्वास

भरतपुर नरेश महाराज रणजीतसिंह सन! 1805 की जनवरी में अंग्रेजो से युद्ध के समय अपने किले की दीवारों पर निर्भीक हो सेना का निरीक्षण कर रहे थे। उनके सैनिकों ने कहा- “अन्नदाता शत्रुओं की तोपे ओले की तरह गोले बरसा रही हैं, आप यहाँ न घूमें।” महाराज ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया- “भैया! जिसकी आ गई है, उसे कोई बचा नहीं सकता और जिसकी आयु शेष है, उसे दुनिया की कोई शक्ति नहीं मार सकती। यह सिद्धान्त अटल है, तब फिर डर कैसा”?

जानवर कौन ???

मधु एक बकरी थी, जो की माँ बनने वाली थी। माँ बनने से पहले ही मधू ने भगवान् से दुआएं मांगने शुरू कर दी। कि “हे भगवान् मुझे बेटी देना बेटा नही”। पर किस्मत को ये मन्जूर ना था, मधू ने एक बकरे को जन्म दिया, उसे देखते ही मधू रोने लगी। साथ की बकरियां मधू के रोने की वजह जानती थी, पर क्या कहती। माँ चुप हो  गई और अपने बच्चे को चाटने लगी। दिन बीत ते चले गए और माँ के दिल मे अपने बच्चे के लिए प्यार उमड़ता चला गया। धीरे- धीरे माँ अपने बेटे में सारी दुनियाँ को भूल गई, और भूल गई भविष्य की उस सच्चाई को  जो एक दिन सच होनी थी। मधू रोज अपने बच्चे को चाट कर दिन की शुरूआत करती, और उसकी रात बच्चे से चिपक कर सो कर ही होती।

एक दिन बकरी के मालिक के घर बेटे जन्म लिया। घर में आते मेहमानो और पड़ोसियों की भीड़ देख मधू बकरी ने साथी बकरी से पूछा “बहन क्या हुआ आज बहुत भीड़ है इनके घर पर” ये सुन साथी बकरी ने कहा की “अरे हमारे मालिक के घर बेटा हुआ है, इसलिए चहल पहल है” बकरी मालिक के लिए बहुत खुश हुई आैर उसके बेटे को बहुत दुआएं दी।

 फिर मधू अपने बच्चे से चिपक कर सो गई। मधू सो ही रही थी कि तभी उसके पास एक आदमी आया, सारी बकरियां डर कर सिमट गई, मधू ने भी अपने बच्चे को खुद से चिपका लिया। तभी उस आदमी ने मधू के बेटे को पकड़ लिया और  ले जाने लगा। मधू बहुत चिल्लाई पर उसकी एक ना सुनी गई, बच्चे को बकरियां जहाँ बंधी थी उसके सामने वाले कमरे में ले जाया गया।

बच्चा बहुत चिल्ला रहा था, बुला रहा था अपनी माँ को, मधू भी रस्सी को खोलने के लिए पूरे पूरे पाँव रगड़ दिए पर रस्सी ना खुली। थोडी देर तक बच्चा चिल्लाया पर उसके बाद बच्चा चुप हो गया, अब उसकी आवाज नही आ रही थी।

 मधू जान चुकी थी केे बच्चे के साथ क्या हुआ है, पर वह फिर भी अपने बच्चे के लिए अँख बंद कर दुआएं मांगती रही। पर अब देर हो चुकी थी बेटे का सर धड़ से अलग कर दिया गया था। बेटे का सर मां के सामने पड़ा था, आज भी बेटे की नजर माँ की तरफ थी, पर आज वह नजरे पथरा चुकी थी, बेटे का मुंह आज भी खुला था, पर उसके मुंह से आज माँ के लिए पुकार नही निकल रही थी, बेटे का कटा सिर सामने पडा था माँ उसे आखरी बार चूम भी नही पा रही थी इस वजह से एक आँख से दस दस आँसू बह रहे थे। बेटे को काट कर उसे पका खा लिया गया। और  माँ देखती रह गई, साथ में बेठी हर बकरियाँ इस घटना से अवगत थी पर कोई कुछ कर भी क्या सकती थी।

 दो  माह बीत चुके थे मधू बेटे के जाने के गम में पहले से आधी हो  चुकी थी, कि तभी एक दिन मालिक अपने बेटे को खिलाते हुए बकरियों के सामने आया, ये देख एक बकरी बोली “ये है वो बच्चा जिसके होने पर तेरे बच्चे को काटा गया” मधू आँखों में आँसू भरे अपने बच्चे की याद में खोई उस मालिक के बच्चे को देखने लगी।

वह बकरी फिर बोली “देख कितना खुश है, अपने बालक को खिला कर, पर कभी ये नही सोचता की हमें भी हमारे बालक प्राण प्रिय होते है, मैं तो कहूं जैसे हम अपने बच्चों के वियोग में तड़प कर जीते है वैसे ही ये भी जिए, इसका पुत्र भी मरे” ये सुनते ही मधू उस बकरी पर चिल्लाई कहा “उस बेगुनाह बालक ने क्या बिगाड़ा है, जो उसे मारने की कहती हो, वो तो अभी धरा पर आया है, ऐसा ना कहो भगवान् उसे लम्बी उम्र दे, क्योंकि एक बालक के मरने से जो पीड़ा होती है मैं उससे अवगत हूँ, मैं नही चाहती जो पीड़ा मुझे हो रही है वो किसी और को हो” ये सुन साथी बकरी बोली कैसी है तू उसने तेरे बालक को मारा और तू फिर भी उसी के बालक को दुआ दे रही है।” मधू हँसी और कहा “हाँ, क्योंकि मेरा दिल एक जानवर का है इंसान का नही।

( कई बार सच समझ नही आता की जानवर असल में है कौन)

***शाकाहारी बनों।

हर जीव के बारे में सोचे।।

खाने से पहले बिरयानी

चीख जीव की सुन लेते।

करुणा के वश में होकर

शाकाहार को चुन लेते।।