अध्याश्तक स्तोत्र – Adhyashtak Strotra

अद्य मे सफलं जन्म, नेत्रे च सफले मम।
त्वामद्राक्षं यतो देव, हेतुमक्षयसंपद:॥ १॥

अद्य संसार-गम्भीर, पारावार: सुदुस्तर:।
सुतरोऽयं क्षणेनैव, जिनेन्द्र! तव दर्शनात्॥ २॥

अद्य मे क्षालितं गात्रं, नेत्रे च विमले कृते।
स्नातोऽहं धर्मतीर्थेषु, जिनेन्द्र! तव दर्शनात्॥ ३॥

अद्य मे सफलं जन्म, प्रशस्तं सर्वमङ्गलम्।
संसारार्णवतीर्णोऽहं, जिनेन्द्र! तव दर्शनात्॥ ४॥

अद्य कर्माष्टक-ज्वालं, विधूतं सकषायकम्।
दुर्गतेर्विनिवृत्तोऽहं, जिनेन्द्र! तव दर्शनात्॥ ५॥

अद्य सौम्या ग्रहा: सर्वे, शुभाश्चैकादश-स्थिता:।
नष्टानि विघ्नजालानि, जिनेन्द्र! तव दर्शनात्॥ ६॥

अद्य नष्टो महाबन्ध:, कर्मणां दु:खदायक:।
सुख-सङ्गं समापन्नो, जिनेन्द्र! तव दर्शनात्॥ ७॥

अद्य कर्माष्टकं नष्टं, दु:खोत्पादन-कारकम्।
सुखाम्भोधि-र्निमग्नोऽहं, जिनेन्द्र! तव दर्शनात्॥ ८॥

अद्य मिथ्यान्धकारस्य, हन्ता ज्ञान-दिवाकर:।
उदितो मच्छरीरेऽस्मिन्, जिनेन्द्र! तव दर्शनात्॥ ९॥

अद्याहं सुकृतीभूतो, निर्धूताशेषकल्मष:।
भुवन-त्रय-पूज्योऽहं, जिनेन्द्र! तव दर्शनात्॥ १०॥

अद्याष्टकं पठेद्यस्तु, गुणानन्दित-मानस:।
तस्य सर्वार्थसंसिद्धि-र्जिनेन्द्र! तव दर्शनात्॥ ११॥

एकीभाव स्तोत्र – Ekibhav Strotra Hindi

कविवर भूधरदास जी कृत भाषानुवाद

दोहा :- वादिराज मुनिराज के, चरणकमल चित्त लाय|
भाषा एकीभाव की, करुँ स्वपर सुखदाय |
(रोला छन्दः “अहो जगत गुरुदेव” विनती की चाल में)

यो अति एकीभाव भयो मानो अनिवारी|
जो मुझ-कर्म प्रबंध करत भव भव दुःख भारी||
ताहि तिहांरी भक्ति जगतरवि जो निरवारै |
तो अब और कलेश कौन सो नाहिं विदारै|1|

तुम जिन जोतिस्वरुप दुरित अँधियारि निवारी|
सो गणेश गुरु कहें तत्त्व-विद्याधन-धारी||
मेरे चित्त घर माहिं बसौ तेजोमय यावत|
पाप तिमिर अवकाश तहां सो क्यों करि पावत|2|

आनँद-आँसू वदन धोयं तुम जो चित्त आने|
गदगद सरसौं सुयश मन्त्र पढ़ि पूजा ठानें||
ताके बहुविधि व्याधि व्याल चिरकाल निवासी|
भाजें थानक छोड़ देह बांबइ के वासी|3|

दिवि तें आवन-हार भये भवि भाग-उदय बल|
पहले ही सुर आय कनकमय कीन महीतल||
मन-गृह ध्यान-दुवार आय निवसो जगनामी|
जो सुरवन तन करो कौन यह अचरज स्वामी|4|

प्रभु सब जग के बिना-हेतु बांधव उपकारी|
निरावरन सर्वज्ञ शक्ति जिनराज तिहांरी ||
भक्ति रचित मम चित्त सेज नित वास करोगे|
मेरे दुःख-संताप देख किम धीर धरोगे|5|

भव वन में चिरकाल भ्रम्यों कछु कहिय न जाई|
तुम थुति-कथा-पियूष-वापिका भाग से पाई||
शशि तुषार घनसार हार शीतल नहिं जा सम|
करत न्हौन ता माहिं क्यों न भवताप बझै मम|6|

श्रीविहार परिवाह होत शुचिरुप सकल जग|
कमल कनक आभाव सुरभि श्रीवास धरत पग||
मेरो मन सर्वंग परस प्रभु को सुख पावे|
अब सो कौन कल्यान जो न दिन-दिन ढिग आवे|7|

भव तज सुख पद बसे काम मद सुभट संहारे|
जो तुमको निरखंत सदा प्रिय दास तिहांरे||
तुम-वचनामृत-पान भक्ति अंजुलि सों पीवै|
तिन्हैं भयानक क्रूर रोगरिपु कैसे छीवै|8|

मानथंभ पाषान आन पाषान पटंतर|
ऐसे और अनेक रतन दीखें जग अंतर||
देखत दृष्टि प्रमान मानमद तुरत मिटावे|
जो तुम निकट न होय शक्ति यह क्योंकर पावे|9|

प्रभुतन पर्वत परस पवन उर में निबहे है|
ता सों तत छिन सकल रोग रज बाहिर ह्रै है||
जा के ध्यानाहूत बसो उर अंबुज माहीं|
कौन जगत उपकार-करन समरथ सो नाहीं|10|

जनम जनम के दुःख सहे सब ते तुम जानो|
याद किये मुझ हिये लगें आयुध से मानों||
तुम दयाल जगपाल स्वामि मैं शरन गही है|
जो कुछ करनो होय करो परमान वही है|11|

मरन-समय तुम नाम मंत्र जीवक तें पायो|
पापाचारी श्वान प्रान तज अमर कहायो||
जो मणिमाला लेय जपे तुम नाम निरंतर|
इन्द्र-सम्पदा लहे कौन संशय इस अंतर|12|

जो नर निर्मल ज्ञान मान शुचि चारित साधै|
अनवधि सुख की सार भक्ति कूंची नहिं लांघे||
सो शिव वांछक पुरुष मोक्ष पट केम उघारे|
मोह मुहर दिढ़ करी मोक्ष मंदिर के द्वारै|13|

शिवपुर केरो पंथ पाप-तम सों अतिछायो|
दुःख सरुप बहु कूप-खाई सों विकट बतायो||
स्वामी सुख सों तहां कौन जन मारग लागें!
प्रभु-प्रवचन मणि दीप जोन के आगे आगे|14|

कर्म पटल भू माहिं दबी आतम निधि भारी|
देखत अतिसुख होय विमुख जन नाहिं उघारी||
तुम सेवक ततकाल ताहि निहचै कर धारै|
थुति कुदाल सों खोद बंद भू कठिन विदारै|15|

स्याद् वाद-गिरि उपज मोक्ष सागर लों धाई|
तुम चरणांबुज परस भक्ति गंगा सुखदाई||
मो चित निर्मल थयो न्होन रुचि पूरव तामें|
अब वह हो न मलीन कौन जिन संशय या में|16|

तुम शिव सुखमय प्रगट करत प्रभु चिंतन तेरो|
मैं भगवान समान भाव यों वरतै मेरो||
यदपि झूठ है तदपि त्रप्ति निश्चल उपजावे|
तुव प्रसाद सकलंक जीव वांछित फल पावे|17|

वचन जलधि तुम देव सकल त्रिभुवन में व्यापे|
भंग-तरंगिनि विकथ-वाद-मल मलिन उथापे||
मन सुमेरु सों मथे ताहि जे सम्यज्ञानी|
परमामृत सों तृप्त होहिं ते चिरलों प्रानी|18|

जो कुदेव छविहीन वसन भूषन अभिलाखे|
वैरी सों भयभीत होय सो आयुध राखे||
तुम सुंदर सर्वांग शत्रु समरथ नहिं कोई|
भूषन वसन गदादि ग्रहन काहे को होई|19|

सुरपति सेवा करे कहा प्रभु प्रभुता तेरी|
सो सलाघना लहै मिटे जग सों जग फेरी||
तुम भव जलधि जिहाज तोहि शिव कंत उचरिये|
तुही जगत-जनपाल नाथ थुति की थुति करिये|20|

वचन जाल जड़ रुप आप चिन्मूरति झांई|
तातैं थुति आलाप नाहिं पहुंचे तुम तांई||
तो भी निर्फल नाहिं भक्ति रस भीने वायक|
संतन को सुर तरु समान वांछित वरदायक|21|

कोप कभी नहिं करो प्रीति कबहूं नहिं धारो|
अति उदास बेचाह चित्त जिनराज तिहांरो||
तदपि आन जग बहै बैर तुम निकट न लहिये|
यह प्रभुता जगतिलका कहां तुम बिन सरदहिये|22||

सुरतिय गावें सुजश सर्व गति ज्ञान स्वरुपी|
जो तुमको थिर होहिं नमैं भवि आनंद रुपी||
ताहि छेमपुर चलन वाट बाकी नहिं हो हैं|
श्रुत के सुमरन माहिं सो न कबहूं नर मोहै|23|

अतुल चतुष्टय रूप तुम्हें जो चित में धारे|
आदर सों तिहुं काल माहिं जग थुति विस्तारे||
सो सुकृत शिव पंथ भक्ति रचना कर पूरे|
पंच कल्यानक ऋद्धि पाय निहचै दुःख चूरे|24|

अहो जगत पति पूज्य अवधि ज्ञानी मुनि हारे|
तुम गुन कीर्तन माहिं कौन हम मंद विचारे||
थुति छल सों तुम विषै देव आदर विस्तारे|
शिव सुख-पूरनहार कलपतरु यही हमारे|25|

वादिराज मुनि तें अनु, वैयाकरणी सारे|
वादिराज मुनि तें अनु, तार्किक विद्यावारे||
वादिराज मुनि तें अनु, हैं काव्यन के ज्ञाता|
वादिराज मुनि तें अनु, हैं भविजन के त्राता|26|

दोहा – मूल अर्थ बहु विधि कुसुम, भाषा सूत्र मँझार|
भक्ति माल ‘भूधर’ करी, करो कंठ सुखकार||